यह काम मेरे मन का हुआ है । कई बार अपने पत्रकारिता के जीवन में मुझे भी ऐसे अवसर आये जब मेंरी इच्छा होती थी की मै फ्लाने फ्लाने नेता को जूतों जूतों मारुं , जमीन में गिरा गिरा के, पटक पटक कर मारूं । लेकिन पत्रकारिता का धर्म सबसे पहले आ जाता , इसलिये मन में आक्रोष होते हुये भी अपने इस आक्रोष को दबा जाता. धीरे धीरे यह सब सहने की आदत पड़ गयी और मै लतिहड़ पत्रकार बन गया । जिसकी अपनी कोई इच्छा न हो और जो केवल एक मशीन की तरह काम करे ।
यही सभी पत्रकार करते है । एक बेजान मशीन की तरह, उनकी अपनी कोई इच्छा नहीं होती । आन्ख के सामने अत्याचार हो रहा है, अनयाय्पूर्ण कार्य हो रहे हैं, लेकिन पत्रकार कुछ कह नहीं सकता, क्योंकि वह एक आब्जर्वर की तरह है, केवल आब्जर्वर, इसके अलावा और कुछ नहीं ।
सरदार जरनैल सिन्घ पत्रकार ने माननीय चिदम्बरम की तरफ़ जूता फेंका, यह मैने पूरा घटना क्रम टी०वी० फूटेज में देखा । इस घटना की जिस तरह से लीपा पोती की गयी वह भी देखा । कुल मिलाकर मेरा निष्कर्ष यह है कि चिदम्बरम ने बहुत गैर जिम्मेदाराना तरीके से व्यव्हार किया, यह उनके पद के अनुरूप नहीं लगता ।
चिदम्बरम पर जूता फेंकने की घटना ने सिक्खों के अन्दर की बात बहुत गहरायी से कह डाली है ।