जैसा कि पहले आशन्का मैने जग जाहिर की थी कि नेताओं की नूरा कुश्ती में “हमाम में सब नन्गे हैं ” वाली मसल चरितार्थ होने जा रही है । सभी दलों को चुनाव में मिले वोटों के रुख को भाम्पकर यह आशन्का हो गयी है कि त्रिशन्कु लोक सभा का मैन्डेट देश की जनता ने जान्बूझकर दिया है । वोटों के दाम देने वाले मौजूद हैं, वोटों के खरीदार घात लगाये बैठे हैं, वोट देने वाला सोचता है, बटन दबाने के लिये पैसे मिल रहे हैं, भले ही एक दो दिन की दारू का खर्चा निकल आयेगा । ऊससे इस बात से क्या मतलब कि मुम्बई में कौन देश हमला कर रहा है, उससे इस बात का क्या सरोकार कि महगायी में कौन कितना पिस रहा है और इसका जिम्मेदार कौन है ? उसको सिर्फ़ अपने सेमतलब है कि नेता जी कुछ दे रहे है, ले लो, और बटन दबाओ । यह है देश के ऐसी सोच रखने वाले ३०% जनता, जिसे केवल प्याज से मतलब है और प्याज में ही उनकी सारी राजनीति समाई हुयी है । प्याज ही उनकी जान है और प्याज में ही उनके प्राण बसते हैं ।
य़ह भारतीय लोकतन्त्र का चेहरा है । क्षेत्रवाद ने तो और दुर्दशा करके रख दी है । अब यही तो फायदा है क्षेत्रीय दलों को कि उनको कितनी कीमत चुकाकर बहुमत लेना होगा ।
सरकार किसी की भी बने, मज्बूत और कमजोर तो लोकतन्त्र होगा । इस तरीके से बनायी गयी सरकारे इस देश की जनता की मानसिकता दर्शाती हैं । इसके अलावा कुछ नहीं ।