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घोटाला करने वालों का देश

क्या अपना देश अब घोटाले दर घोटलों का देश कहलाया जाने लगेगा ?

वह दिन दूर नही लगता , जब यह देश घोटलेबाजों का देश कहलाया जाने लगेगा / हमारे देश के नेता ताल ठोंक कर घॊटाला पर घॊटाला किये जा रहे है और हम सभी तमाश्बीन की तरह बैठे हुये देख रहे है और कुछ कर नहीं पा रहे है / यह हमारे लिये असहाय की स्तिथि बन गयी है /

सरकार तो बिल्कुल उदासीन है और मौजूदा सरकार तो कतई चाहिती ही नहीं है कि इन सभी घॊटालों से पर्दा उठे / इतनी बडी बडी रकम के घोटाले हुये है कि दिमाग चकरा जाता है कि इस देश के नेताओं का हाजमा कितना अच्छा है कि वे इतनी बड़ी बड़ी रकमें हजम किये जा रहे है और डकार तक नहीं ले रहे है /

यह भ्रष्टाचार की पराकाष्ठा है / ताज्जुब की बात यह है कि इसे रोकने में किसी की भी किसी किस्म की कोई दिलचस्पी नहीं है, चाहे वह जनता हो, राज्नीतिक दल हों या इस देश का स्वतन्त्र मीडिया /

वजह बिलकुल साफ़ है, मामला पैसे सन्चय करने के सवाल से जुड़ा है / माले मुफ्त दिले बेरहम वाली मसल है / स्विस बैन्कों में जमा कई लाख करोड़ रुपया किसका है ? सब जानते है कि किसका पैसा है और कौन जमा कर रहा है, सरकार को सब पता है /

वास्तविकता तो यही समझ में आती है कि हमारे देश के नेता ही नही चाह्ते कि इस देश से भ्रष्टाचार दूर हो, बल्कि वे स्वयम चाह्ते है कि भ्रश्टाचार और ज्यादा से ज्यादा खूब फले फूले /

hello, kya aap mujhe dhanbal aur bahubal se grasit rajniti desh ke liye abhishap hai.is par apne vichar bata sakte hai.

हेलो, क्या आप धन बल और बाहु बल से ग्रसित राज नीति देश के लिये अभिशाप है , इस पर अपने विचार बता सकते है….???

यह सवाल एक बहन ने किया है /

राजनीति अगर किसी दबाव में रहकर सम्पन्न की जाती है, तो फिर राज नीति मे स्वतन्त्रता कहां रह गयी ? यह तो प्रेशर पालिटिक्स हो गयी / जबकि राजनीति में जितने भी निर्णय लिये जाते है, उनके बारे में हमेशा ही यही मान्यता रही है कि जो भी निर्णय लिया जाय वह हर तरफ से दबाव मुक्त हों ताकि किसी भी कोण से कभी भी आन्कलन किया जावे या देखा जावे तो हर एन्गल से सम लगे और बराबर एक सा लगे ? राज्नीतिक निर्णय सन्तुलित लगे /

धन बल पर आश्रित राजनीति धन के दबाव की राज्नीति है / मसल पावर की राज्नीति गुन्डागर्दी और मार काट के भय की राज नीति है, दहशत की राज्नीति है / दोनो ही प्रकार अनुचित और बेजा दबाव बनाते है / यह सब किसके फायदे के लिये किया जाता है ? यह आदर्श राज नीति कहां रह गयी ?

इस तरह की राज नीति न तो देश के लिये शुभ है और न इस देश की जनता के लिये शुभ लक्षण है /

अफ्सोस की बात यह है कि आनेवाले दिनों में पन्चायत से लेकर लोक सभा तक यही दोनो वर्ग यानी “धन बल” और “बाहु बल” का वर्चस्व बढेगा और इसे कोई नहीं रोक पायेगा / चाहे कितने भी कानून बना दिये जांय, इनकी फसल हमेशा बढेगी /

इस तरह के बलियों को केवल जनता ही रोक सकती है / लेकिन इसकी उम्मीद मुझे बिल्कुल नही लगती, क्योन्कि इस मसले पर जनता खुद ही एक नहीं है /

कब्जा करके बनाये जा रहे मन्दिर और धार्मिक स्थल ; मेरे साथ हुआ हादसा

सोमवार २० सितम्बर सन २०१० को मेरे मकान के सामने बार्डर लाइन के आगे २ फुट नाला की जमीन छोड़कर आस पास के अराजक तत्वों ने सामने ही स्तिथी एक पीपल के पेड़ के नीचे की जमीन घेर कर पहले एक चबूतरा बनाया और बाद में उस पर हनुमान जी की मूर्ती रखने का इन्तजाम किया जाने ही वला था कि तब तक मै वहं पहुन्च गया /

पीपल के पेड़ के नीचे की जमीन पर चबूतरा बनाने का कार्य क्रम कई दिनो से चल रहा था , लेकिन आस पास के किसी भी व्यक्ति ने मुझे खबर नहीं की /

मै कानपुर शहर में रहता हूं / जहा यह मामला हुआ वह मेरे घर से लगभग ५ किलोमीटर दूर का है , जहां मेरी पुश्तैनी जमीन है / मकान पुराना होने के कारण और सामने की दुकान खाली होने की वजह से मैने चार फ़ुट की दीवाल बना दी ताकि कोई अपनी समान न रख सके / इस दीवाल से बिल्कुल सटी हुयी नगर पालिका की बड़ी २ फ़ुट चौड़ी नाली है , जिस पर पत्थर रख दिये गये है / इसके बाद सरकारी जमीन है /

रात में मुझे लगभग ८ बजे किसी ने खबर की कि आपके घर के सामने कुछ लोग हनुमान जी का मन्दिर बना रहे है / सन्योग की बात है कि उसी समय एक सज्जन मेरे पास बैठे हुये थे, जैसे ही यह बात मैने उन सज्जन के सामने बतायी , उन्होने तुरन्त कहा कि आप अभी जाकर उस जगह का मुआयना करे / आप्की जमीन पर कब्जा होने जा रहा है / कल मन्गल वार भी है और बुढवा मन्गल होने से यह शक हो रहा है कि लोग आपकी जमीन पर कब्जा करके आपकी बिल्डिन्ग की रौनक खत्म करने पर तुले हुये है / आप अभी चलिये और देखिये की माजरा क्या है /

मै तुरन्त अपने बेटे के साथ और उन सज्जन को लेकर मकान की तरफ़ भागा / वहां जाकर सब देखा / चबूतरा बनाया जा चुका था / एक तरफ़ कुछ दूरी पर एक दुकान के पास हनुमान जी रखे गये थे/ पीपल के पेड़ पर एक लाल रन्ग की ध्वजा एक कील से ठोंक दी गयी थी /

मैने वहां उपस्तिथि लोगो से पूछा कि यह सब किसका काम है / यह सब किसी ने नहीं बताया कि यह किसका काम है / कुछ देर रहने के बाद मै थाना पुलिस पहुन्चा वहा तहरीर दी कि ऐसी वार्दात हुयी है / इस समय तक रात के साढे नौ बज चुके थे / थानेदार खाना खा रहे थे, उन्होने कहा कि मै अभी खाना खाकर द्स मिनट में आपके साथ चलता हू /

मै पुलिस लेकर अपने मकान आया और पुलिस ने मौका मुआयना किया / थानेदार ने कहा कि यह तो सन्ग्येय अपराध है / सरकारी जगह पर कानूनन ऐसे निर्माण करने का किसी को अनुमति नहीं है / उन्होने कहा कि रात काफी हो चुकी है अभी आप जाइये, कल दिन मे १२ बजे आइये/

मै वापस कानपुर चला आया, इस समय रात के ११ बजे के बाद का समय हो चुका था /

दूसरे दिन मै थाने पहुन्चा, थानेदार अपने बड़े अधिकारी के साथ मीटिन्ग कर रहे थे / क्योकि २४ सितम्बर की वजह से पुलिस अपने पुख्ता इन्त्जाम मे लगी हुयी थी / नागरिकों के साथ मीटिन्ग थी और नेताओं अधिकारियों का आना जाना तथा पुलिस का पुख्ता और सटीक इन्तजाम देखकर मै क्या सभी लोग दहसत में आ गये थे, लेकिन अपने अन्दर के मन में यह विश्वास भी भर रहा था कि किये जा रहे इन्तजाम से हम सभी नागरिक एक्दम सुरक्षित है और हम सब को बिना डरे अपने सभी काम उसी तरह से करना चाहिये जैसा हम रोज करते है /

अभी यह सब महौल थाने के अन्दर चल ही रहा था, सी०ओ० साहब पहले वहां से मीटिन्ग करके निकले, बाद में नेता गण और फिर धीरे धीरे सामान्य जन / मै लगभग दो घन्टे थाने के गेट पर खड़ा रहा और इन्तजार करता रहा कि कब मुझको अन्दर जाकर थानेदार साहब से मिलने का अवसर मिलेगा /

बहरहाल मै थानेदार साहब के सामने रक्खी हुयी कुर्सी पर बैठ गया, वे बहुत व्यस्त थे / आधा घन्टा बाद मेरी तरफ मुखातिब हुये / उन्होने कहा कि सार्वजनिक और सरकारी जगह पर कब्जा करना सन्ग्येय अपराध है /

मै कुछ देर बाद वापस कब्जे वाली जगह पर आया तो देखा कि किसी ने एक और हनुमान जी की पथ्थर की मूर्ती सीमेन्ट लगाकर रख दी है / मुझसे बर्दास्त नहीं हुआ, मैने अपने नौकर से कहा कि मै इन मूर्तियों को हटाये दे रहा हूं , तुम इस चबूतरे को तोड़ना शुरू करो / मेरे साथ मेरा बेटा भी था /

मैने एक झटके में हनुमान जी को उखाड़ा तथा दूसरे हनुमान जी को उठाकर नीचे रख दिया और हथौड़ा लेकर चबूतरा गिराना शुरू कर दिया / कुछ देर में ही वहा भीड़ लग गयी / बोला कोई नहीं / बजरन्ग दल के एक नेता आकर मुझसे पूछने लगे कि आप क्यों हनुमान जी का चबूतरा तोड़ रहे हैं ? मैने कहा यह अवैध है / मेरी उनसे बहस होने लगी / वे नेतागी्री दिखाने लगे / एक नेता विश्व हिन्दू परिषद के भी आ गये / वाद बिवाद जारी रहा / मैने काम नहीं रोका और बराबर चबूतरा तोड़ने में लगा रहा /

तभी किसी ने उन नेताओं से कहा कि कल रात में पुलिस आयी थी और पन्डित जी की लिखित तहरीर थाने में जमा है / यह सुनकर नेता जी खिसक लिये और फिर कोई लौट्कर नहीं आया / मैने उस चबूतरे को जमीन दोज करके बराबर कर दिया /

लोग कह रहे थे कि आपने सही समय पर जागरुक होकर अवैध निर्माण बनाने से रोका / जिस स्थान पर इस तरह का निर्माण हो रहा था वह कानपुर लखनऊ हाई वे है / ऐसे जाने कितने मन्दिर बन गये है जो हाई वे के किनारे किनारे बनये गये है /

मुझे बाद में पता चला कि इस सबके पीछे सफ़ेद्पोश नेताओं , नशेबाजों, स्मैकियों, पियक्कड़ॊ का हाथ था / ऐसे और इस तरह्से कब्जा जमाने वालों की नीयत कीमती जमीन पर कब्जा जमाकर उस पर दूकाने बनवाकर या जगह घेर कर रहने के साथ साथ कमाई का जरिया बनाने का होता है / धरम से उनका कोई लेना देना नहीं होता / जहां यह कब्जा हो रहा था, उसके १० कदम पर ही एक अच्छा खासा पुराना मन्दिर बना हुआ है / अगर सबको इतनी ही श्र्द्धा होति तो उनको पास के मन्दिर में जाना चाहिये था / इस तरह के नये मन्दिर बनाने क्या जरूरत थी /

वास्तविकता यह है कि देश को अगर इन सब बातों से बचाना है तो इसके नियन्त्रण के लिये कड़े कानून और सजा की जरूरत है /

कल्पना करें यदि मुझसे जरा सी भी चूक हो जाती और कुछ घन्टॊं का फरक पड़ जाता और अगर मै इस तरह के स्टेप न लेता, तो वहं मन्दिर बन जाता, तब क्या मै इस मन्दिर को हटा पता ? जवाब यही होता, शायद नहीं और कभी नही / यह पर्मानेन्ट बन जाता और फुट्पाथ पर कब्जा करके वहां दुकाने बन जातीं वही कब्जा जमाने वाले अपना घर बना लेते और रहने लगते / देश का कोई कानून इनको हटा भी नहीं सकता था /

जो मकान मालिक है, जिनकी जगहें खाली पड़ी है, वे सब बहुत सतर्क रहें / किसी की भी कीमती जमीन एक छोटे मन्दिर के कारण बरबाद हो सकती है / देश का कोई भी कानून इस कब्जे के सामने टिक नही सकता और इस मसले पर सभी न्यायालय चुप हो जाते है / कानपुर में ही हजारों ऐसी जगहें है जहं इस तरक के निर्माण रोजाना बड़ी सन्खया में हो रहे है और यह सिल्सिला थम नही रहा है / कही भी किसी भी सड़्क पर निकल जायें ऐसे निर्माण आपको बड़ी सन्खया मे देखने को मिलेन्गे /

सवाल यह है कि इस तरह के हादसे कब रोके जायेन्गे और इन्हे रोकेगा कौन? कानून तो बेकार हो चुका है /

क्या शान्ति की बात [करना] कायरता है ?

एक बहन ने यह सवाल उठाया है , मै इसे प्रश्न रूप में ही छोड़ देना चाहता था और इस प्रश्न का उत्तर देने के लिये मै यही इन्तजार कर रहा था कि शायद कोई पाठक इस पर अपने विचार रखे /

फिर भी मै जो भी सोचता हूं इस बारे मे, वह मै जरूर कहून्गा /

शान्ति की बात करना कोई कायरता नही है / न ही इसे कायरता के रूप में लेकर सोचना चाहिये / जब भी शान्ति की बात की जाती है , उसके कई मायने निकलते है / ये इस तरह के समीकरण होते है, जो देश , काल और परिस्तिथियों के अनुसार बनते और बनाये जाते है / इसके कूट्नीतिक अर्थ भी होते है / जो विश्व की राज्नीतिक स्तिथि, आस पास पड़ोस की सरकारों की सोच और मित्र तथा शत्रु तथा कौन साथ देगा और कौन नही, इन सब बतों पर निर्भर करता है / बहुत सी परिस्तिथियां इस तरह की बन जाती है, जहा पर सिवाय शान्ति की बात करने के अलावा दूसरा रस्ता ही नही बचता है /

हम कब तक किसी से लड़ सकते है, क्या यही एक काम हमारे पास होगा कि हम बराबर लड़्ते ही रहे ? क्या हमारे पास इस लड़ने के अलावा और कोई दूसरा काम ही नहीं है ? हम लड़ करके क्या हसिल कर लेन्गे या करेन्गे ? लडायीइयों से न तो कभी कोई फैसला हो पाया है और न कभी होगा ? लड़ायी तो खुद ही एक समस्या है, एक मसला है, इसलिये लड़ायी करके कोई यह सोचे कि वह कुछ कर लेगा, एक बच्चे जैसी सोच साबित होगी /

जैसा कि मैने पहले कहा है कि शान्ति की बात करना कायर्ता नहीं है बल्कि यह एक ऐसी सकारात्मक सोच है जिससे समाज और देश , हम और आप , उस प्रगति के मार्ग पर आगे बढने के लिये सुरक्षित महसूस करते है, जो केवल शान्ति के रास्ते से ही आती है / इसलिये शाति की बात करना एक सुरक्षा की गारन्टी का पहलू भी है जो सब्से जुड़ा है /

क्या यह “राष्ट्र” एक “दुकान” समझकर चलाया जा रहा है ?

पिछले कई माह से मै लगातार देखता और समझता चला आ रहा हूं कि क्या यह देश एक दुकान की तरह चलाया जा रहा है ?

मुझे तो यही समझ में आ रहा है / इस देश को दुकान की तरह चलाने वलों में मैने सर्कार में बैठे श्रेष्ठ दुकान्दारों को चिन्हित किया है /

इसमें सबसे आला नम्बर में हमारे लोक प्रिय हरदिल अजीज नेता आदर्णीय प्रधान मन्त्री सरदार मन मोहन सिन्ह जी, जिन्हे सारी दुनिया एक बेहतर अर्थ शास्त्री मान चुकी है और इसकी गवाह वे राष्ट्रिय और अनतर राश्ट्रिय विश्व विद्यालयों द्वारा अताह फरमायी गयी नाजिर डिग्रीयां है, वे पहले दुकान दार है जो दुकान चलाने वाले दल के मुखिया है /

नम्बर दो के दुकान्दार है श्री चिदाम्बरम जी, जिनके ऊपर किसी जमाने में एक सर्दार पत्रकार ने जूता का अक्स दिखा दिया था /

तीसरे नम्बर पर है सरदार मोन्टेक सिह अहलूवालिया और चौथे नम्बर पर है मराठा छत्रप श्री शरद पवार जी / अगर ये महिला होते तो इन्हे मै ललिता पवार से कतई कम न समझता /

यही सब मिलकर इस देश को एक दुकान की तरह चला रहे है /

किसी की कोई जिम्मेदारी नही, जो हॊ रहा है उसे होने दीजिये / सरदार जी ने यह कहकर सबकी हवा निकाल दी कि , महगायी को कम करना उनकी जिम्मेदारी नही है /

अब इन्हे कौन सम्झाये कि आदर्णीय इन्दिरा गान्धी कैसे महगायी को रोकने मे सक्षम थी ? कैसे इनके पूर्ववर्ती प्रधान मन्त्री अटल भिहारी वाजपायी जी ने महगायी पर लगाम लगायी थी ? उनके जमाने में आटा ७ और साढे सात रुपये किलो बिका था, आज बीस से बाइस रुपये किलो बिक रहा है /

सच यही है कि इस देश को एक दुकान की तरह चलाया जा रहा है, मन्मोहन सिह जी का अर्थ शास्त्र तो यही समझ में आता है ?

दैनिक जागरण कानपुर अखबार मे छप रहे ‘जन जागरंण‘ अभियान द्वारा न्याय व्यवस्था के बारे में

इस समय मेरी उमर लगभ ६५ वर्ष की है / मै जब १४ साल का था , तब पहली बार मेरे पिता जी मुझे कानपुर कचहरी ले गये थे / मेरे पिता जी व्यवसायी थे और मै तीन भाइयों में बीच का हूं / पिता जी की तबियत खराब रहती थी, इसलिये जब तक वे मुकदमों की पैरवी कर सकते थे , तब तक वे करते थे / जब तबियत खराब रहने लगी तो कचहरी की दौड़ धूप करने के लिये , वे मुझे साथ में ले जाने लगे /

मै और पिता जी जज साहब की अदालत के सामने बैठ जाते और पुकार का इन्तजार करते / वे मुझे बताते कि अहलमद जब पुकार लगाये , तब कह देना कि हाजिर हैं और अभी बाबू जी [ वकील साहब] को बुलाकर लाते है / पुकार होने के बाद जब मै कहता कि हाजिर है तो अहलमद कहता कि जाओ वकील सहब को बुला लाओ/

मै दौड़ कर जाता और वकील साहब को उनके बस्ते से बुला लाता / कभी कभी वकील साहब बस्ते में नहीं होते, तो उनको ढून्ढ कर लाते / यह सब करते करते पूरा दिन बीत जाता और आखिर में तारीख लेकर वापस आ जाते /

मै देखता था कि जो मुकदमे मेरे १४ साल की उम्र में दाखिल हुये थे उनका फैसला मेरी शादी के बाद हुआ/ यानी ५ या छह साल फैसले में लग गये / उस समय मेरी इतनी अकल नहीं थी कि मुकदमा होता कया है ?

कभी कभी मुझे अकेले जाना पड़्ता क्योंकि पिता जी हृदय रोग से पीड़ित थे और मेरे अलावा किसी को मुकदमे की पैरवी के बारे में जानकारी नहीं थी /

पिता जी के छोड़े गये मुकदमों मे से कई तो मुझे उनकी मृत्यु के बाद लड़्ने पड़े /

आज मुझे पचास से अधिक साल हो गये है मुकदमा लड़्ते लड़्ते, मुझे मेरी जवानी कब आयी और कब गयी , कुछ पता ही नहीं चला /

कुछ मुकदमें ३० साल में निपट पाये, किसी में कुल मिलाकर ३५ साल लग गये / पिछले २० सालों से मैने एक पैरोकार रख लिया है जो मुकदमों की पैरवी करने जाता है / हर सप्ताह एक से लेकर छह तारिखें पड़ती है /

भारतीय न्यायिक वयवस्था में बहुत सी कमियां और खामिया है, इनका मैने अध्य्यन किया है / इन कमियों का वकील और मुवक्किल दोनों बहुत फायदा उठाते है / मेरा लाखों रुपया किरायेदार लेकर भाग गये और कोई भी कोर्ट मेरा पैसा नही दिलवा सकी / मेरा वकील एक मुस्लिम है, जो पिछले ३५ सालों से मेरे मुकदमे देख रहे है, मै उनको हर माह एक निश्चित रकम दे देता हू और उनसे हाथ जोड़ लेता हू कि जो भी दे रहा हू उसे रख ले /

दैनिक जागरण द्वारा शुरू किये गये इस ‘ ‘ न्यायिक बदलाव ‘ ‘ में मै अपना योगदान जरूर करून्गा और लोगों को बताउन्गा तथा सरकार को भी उन कमियों की ओर इन्गित करून्गा, जिनसे न्याय देरी से मिल रहा है और इसके पीछे के कारण क्या है और कौन कौन से है ?

सानिया मिर्जा के परिवार वालो ने क्या समझ कर उसकी शादी एक गैर मुल्की इन्सान से तय की ?

सानिया मिर्जा के परिवार वालो ने क्या समझ कर उसकी शादी एक गैर मुल्की इन्सान से तय की ?

पिछले एक सप्ताह से टेनिस की खिलाड़ी सानिया मिर्ज़ा की शादी को लेकर इतना बखेड़ा और हाय तोबा मची हुयी है कि अब यह मसला खिंचते खिंचते पाकिस्तान की सरकार तक जा पहुचा है । यह शादी क्या हो गयी , झगड़े की जड़ बन गयी है ।

जब शादि ब्याह के मसले घर की चहार दीवारी से बाहर आ जाते है, तो पास पड़ोस के लोगों को बोलना ही पड़ जाता है । हलाकि शादी व्याह करना या न करना व्यक्ति की अपनी स्वतन्त्रता पर है, लेकिन जब कोई डिग्नेटरीज का मामला हो तो उसका असर सभी पर पड़्ना स्वाभाविक है ।वे एक मश्हूर टेनिस की खिलाड़ी हैं और भारत की ओर से खेलती है । यहं उनको जितनी सुविधायें मयस्सर है , वे शायद उनको पाकिस्तान में कभी भी नहीं मिलेंगी ।

१- पहला यह कि वे शादी होते ही पाकिस्तान की नागरिक हो जायेंगी और भारत से उनक रिश्ता हमेशा के लिये खतम हो जायेगा, भले ही उनका जन्म यहां हुआ हो और उनके माता पिता यहां रह रहे हों ।

२- पाकिस्तान से भारत के रिश्ते हमेशा तनाव पूर्ण रहेन्गे और इसमे नर्मी कभी भी नहीं यह आयेगी, इस सूत्र को गान्ठ बान्धकर रख लेना चाहिये । यदि सानिया शादी करती है तो उनका दर्ज़ा एक पाकिस्तानी का होगा और वे केवल यहां मेहमान बन कर ही आ पायेंगी ।

३- भारत में उनको जितनी स्वतन्त्रता से और अधिक अवसर टेनिस खेल से सम्बन्धित मिल सकते हैं , उनको पाकिस्तान में शायद ही मिल सकें, यह तो उनको भी पता होगा कि टेनिस खेल की पाकिस्तान में क्या दुर्दशा है ? भारत में तो उनके लिये खेल मन्त्रालय से लेकर जिला स्तर तक टेनिस के खेल को लेकर अपार सम्भावनायें है । यह उनको पाकिस्तान में तो मिलने से रहा ।

४- पाकिस्तान अभी और बुरे दौर से गुजरेगा । तालिबान इनका पीछा छोड़ेंगे नही, न जल्दी जल्दा, अफगानिस्तान की समस्या क कोई हल निकलेगा । अब यह मुतवातिर चलता रहेगा । कौन जाने कब कहीं से किसी तालिबान का फरमान जारी हो जाये कि पाकिस्तान की महिलायें टेनिस कतई न खेलें क्योंकि यह इस्लाम के उसूलों के खिलाफ़ है और उनको मार डालने की धामकी दे दी जाये, वे तब क्या करेंगी ? हिन्दुस्तान में तो वे महफ़ूज है, लेकिन वहां क्या होगा ? सवाल सिक्योरिटी और जीवन की रक्षा से जुड़ा हुआ है ?

५- दुबई में रहने से क्या होगा ? कोई कितने दिन अपनों से अलग होकर रह सकता है ? दुबई में कितने दिन रहेंगे ? क्या वहां से टेनिस खेली जायेगी ? सवाल एक और है, सानिया किस देश के लिये टेनिस खेलेंगी ? हिन्दुस्तान से तो उनका पत्ता साफ हो जायेगा, वे पाकिस्तान की नागरिक हो जायेंगी । भारत सरकार किसी पाकिस्तानी को देश की तरफ से खेलने देगी ? मेरे विचार से तो यह नामुमकिन है, क्योंकि इतने बखेड़े विरोधी खड़े कर देन्गे कि सर्कार को भी सोचना पड़ेगा । इस लिये सानिया को अब समझ लेना चाहिये कि शादि यदि की तो उनका कैरियर बिल्कुल खतम हो जायेगा और जो आज लोग उनको सर पर बठाये हुये है , वे उनको जमीन्दोज करने में एक सेकन्ड भी नहीं लगायेन्गे ।

६- अपना परिवार अपना होता है । सैकड़ों लोग , हज़ारों लोग और करोड़ों लोगों कि भावनायें राष्ट्र के स्वाभिमान से जुड़ी होती है । भारत का कोई भी सितारा पतन के गर्त में गिरता है तो लोग उसको बचने की सलाह देते है । क्या सानिया को कोई भी भारतीय मुसलमान ऐसा नहीं मिला जो उनको एक पाकिस्तानी से शादी करनी पड़ रही है ? यह ऐसा सवाल है, जो मैं नहीं, मेरे मुसलमान दोस्त उठा रहे हैं । मेरा मानना है कि भारत के लगभग सभी मुसलमान इस शादी से कतई खुश नहीं हैं ।

७- तजा तरीन शादी बहुत से सपने, बहुत सी रन्गीनियां लेकर आती है, लेकिन कुछ दिन बाद जैसे जैसे हकीकत रूबरू होती जाती है, वैसे वैसे ही सारे सपने टुटते देर नहीं लगती । बाद मे एक गलत निर्णय लेने का खामियाजा अजब भुगतना पड़्ता है, तब पता चलता है कि उनके द्वारा की गयी एक गलती कितनी कहतर्नाक उनके लिये साबित हुयी ।

मै कहना तो बहुत चाह्ता हुं , लेकिन मुझे सानिया के इस निर्णय पर आश्चर्य जरूर हुआ ।

हलाकि शादी व्याह करना व्यक्ति की अपनी रुचि पर निर्भर करता है, लेकिन जिस देश ने सानिया को इस मुकाम तक पहुंचाया, उनको देश के उच्च से उच्च सम्मानों से नवाजा गया, देश के लोगों नें उनके खेल को सराहा और उनसे बहुत सी उम्मीदें भविष्य के लिये लगा के रखीं, उनके इस तरह से किशी पाकिस्तानी के साथ शादी करने के निर्णय से निश्चय ही इस देश के प्रत्येक भारतीय को ठेस पहुंची है ।