“भ्रष्टाचार” तो पूर्व प्रधान मन्त्री माननीय जवाहर लाल नेहरू के प्रधान मन्त्रित्व के शाशन काल और उनके प्रशासनिक समय की देन

“भ्रष्टाचार” तो पूर्व प्रधान मन्त्री माननीय जवाहर लाल नेहरू के प्रधान मन्त्रित्व के शाशन काल और उनके प्रशासनिक समय की देन है / यह कोई आज की बात नहीं है / कोई अगर यह कहे कि भ्रष्टाचार आज के समय की देन है तो यह बेईमानी होगी /

सन १९५५ के बाद से ही इस देश में केन्द्र शासन के स्तर पर भ्रष्ट आचरण की नींव पड़ना शुरू हो चुकी थी / यह आचरण नया नया शुरू हुआ था यानी यह कहा जाय कि भ्रष्टाचार का इस देश में पदार्पण का पहला कदम शुरू हुआ था /

आम लोग इस तरह के कदाचरण की चर्चा करते थे /

सन १९६० के आस पास की बात होगी, जब प्रधान मन्त्री श्री जवाहर लाल नेहरू के समय की सरकार में शामिल गृह मन्त्री श्री गुलजारी लाल नन्दा जी ने इस पनपते और सिर उठाते हुये भ्रस्टाचार से आजिज होकर सन्सद के अन्दर और बाहर यह कहा कि ” इस देश से मै दो साल के अन्दर भ्रस्टाचार को मिटा दुन्गा ” /

उस समय गृह मन्त्री श्री गुलजारी लाल नन्दा के इस बयान पर बहुत बवाल हुआ / कांग्रेस पार्टी के नेताओं ने इसका बहुत विरोध किया / जनता के बीच इस बयान का बहुत सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं हुयी / इस देश की जनता ने उनके इस बयान का कोई स्वागत नहीं किया / सबने उनके इस बयान की बहुत खिल्ली उड़ाई /

दो क्या, कई साल बीत गये / लेकिन भ्रष्टाचार जहां का तहां बना रहा / दो साल मे भ्रस्टाचार को समाप्त करने का दावा करने वाले श्री गुलजारी लाल नन्दा आखिर में इस दुनिया से ही निपट गये /

बाबा रामदेव जी को अब क्या करना होगा ?

मै बाबा राम देव जी का बहुत सम्मान करता हू / जब वे योग शिक्षा छोड कर राजनीति में उतरने का प्रयास कर रहे थे, मै उसी समय उनको इस ब्लाग के माध्यम से कुछ सलाह देने वाला था / लेकिन मुझे समय नहीं मिला और मै जो उनको बतौर सलाह देना चाहता था , वह नही कर सका /

मै भूतकाल में क्या हुआ, अब इसके बारे मे छोड़्कर , बाबा के लिये कुछ कहना चाहता हूं /

१- बाबा अब आपके लिये सबसे अच्छा होगा कि आप सन्तुलित मष्तिष्क के साथ जो भी कहें, उसके दूरगामी परिणामों के बारे में आन्कलन करके ही इस देश की जनता के बीच अपने विचार रखें / जो भी कहें उसका कुछ तर्क हो और वह सकारात्मक भी हो / निगेटिव सन्देश से बचें /

२- टकराव की राजनीति न करें / आपको राजनीति से क्या लेना देना ? आप स्वामी विवेकानन्द जी को ले / उनके जीवन को देखें , उनके कार्यों को देखे ? विचार करिये कि क्या यह सब उन्होने किसी राज्नीतिक दल के साथ मिलकर किया ?

३- आपके साथ और आपके समर्थकों के साथ जो भी हुआ, इससे देश के सभी भाग के लोग, नागरिक और देशवासी दुखी, क्षोभ और गुस्से से भरे हुये है / सबके अपने अपने भावनाओं के व्यक्त करने के अलग अलग तर्क है / सन्सार के सबसे बड़े लोकतन्त्र शाशन प्रणाली को अपनाने वाले देश होने के नाते इस तरह के सरकारी अत्याचार को जायज ठहराना किसी भी द्रष्टिकोण से सही नहीं है / अगर सरकार को यही सब करना है तो लोकतन्त्र का क्या मतलब ? यह तो डिक्टेटरशिप हो गयी / आपका जीवन कीमती है, अभी आपको बहुत कुछ करना है और हम सभी आपसे आशा करते है कि आप नागरिको के अधिकारों के लिये उन्हे जागृत करने का प्रयास करेन्गे /

४- आपने “अनशन” करके अपना विरोध व्यक्त कर दिया / विरोध करने के लिये इतना काफी है / अब आप अपना अनशन खत्म करिये और आगे क्या करना है , इस पर विचार करिये /

५- अभी कुछ समय आत्म मन्थन करें /

६- आपके साथ जो भी हुआ है उसके लिये आपके पास अदालतों के दरवाजे खुले हुये है / मीडिया के पास जाइये / ह्यूमेन राइट्स के ्पास जाइये / इस देश के राष्ट्रपति के सामने अपनी बात कहिये /

७- अपने समर्थकों की सन्ख्या हर राज्य में बढाने का प्रयास करें / इसके लिये आप छोटे से छोटे गांव तक जाने का प्रयास करें / आप अपनी इस बनायी हुयी जन शक्ति पर भरोसा करिये / यह जन शक्ति ऐसी हो जो किसी भी चुनाव क्षेत्र में हो रहे चुनाव में निर्णायक भूमिका निभा सके /

८- आप अपने को खुद राज्नीति से अलग रखें / आप खुद “किन्ग” न बने बल्कि “किन्ग मेकर” बने

आखिर में मै यही आपसे अपील करून्गा कि अनशन छोड़्कर दुबारा स्वस्थ्य मन और स्वस्थय तन के साथ तरोताजा होकर अगली नीति पर
विचार करें /

भारत का इतिहास बताता है कि राजा की सत्ता हमेशा अपना महल छोड़्कर साधू की झोपड़ी में मथ्था टेकने के लिये गयी है /

मौजूदा सरकार के सामने पैदा हुये सन्कट से कैसे निपटा जाय ?

देश की हालत बहुत विषम परिस्तिथियों मे पहुन्च चुकी है / भारतीय समाज में इस समय सभी राज्यों मे नागरिकों के बीच भ्रष्टाचार के मुद्दे पर उथल पुथल मची हुयी है और अगर समय रहते इससे नहीं निपटा गया तो स्तिथि बहुत बद से बदतर होती चली जायगी /

जो पिछले एक हफ्ते मे हुआ , वह सभी जानते है / मै इसे दोहराना नहीं चाहता / मै कुछ सुझाव सरकार को दे रहा हूं, शायद इससे कोई बात बन जाये /

१- सारे बवाल की जड़ केन्द्रीय मन्त्री कपिल सिब्बल है / इनसे प्रधान मन्त्री जी को फौरन स्तीफा ले लेना चाहिये और सरकार से निकाल बाहर करना चाहिये / इस मन्त्री की वजह से सारा बवाल हुआ है /

२- सरकार के दूसरे मन्त्री सुबोध कान्त सहाय को भी हटाकर इनको कान्ग्रेस सन्गठन के किसी पद पर बैठा देना चाहिये या किसी राजय का प्रभारी बना देना चाहिये /

३- पुलिस के दो तीन आला अधिकारियों को सस्पेन्ड कर देना होगा और कुछ अन्य पुलिस कर्मियों को भी इसी तरह की दन्डात्मक कार्यवाही करके बाहर करना होगा और चार्ज शीट्ड करना होगा /

४- एक जान्च आयोग का एलान करना होगा जो सारी atrocities की जान्च करके सरकार को बताये कि आखिर क्या कारण थे जिनकी वजह से ऐसा करना लाजिमी था /

५- सरकार ” न नुकुर ” करके स्वीकार करे कि उसको अन्धेरे में रखकर प्रधान मन्त्री या मन्त्रियों के समूह को बिना बताये ऐसी कार्य्वाही की गयी, जिसका सभी को पछतावा है /

६- सिविल सोसायटी के प्रस्तावित बिल की ड्राफ्टिन्ग और मन्त्रियों के समूह के बीच हो रहे वाक युद्द की जड कपिल सिब्बल है, जब सिब्बल बाहर हो जायेन्गे तो जो परिस्तिथियां बने उनके अनुसार यह कहने का मौका मिलेगा कि बिल के लिये थोड़ा और समय चाहिये क्योंकि सिब्बल के जाने के बाद मन्त्रियों की सन्ख्या चार रह जायेगी /

७- बाबा रामदेव जो कुछ कह रहे है, उनको सुनिये और राज्नीतिक तौर तरीके से सरकार निपटे / बाबा फटेहाल है, वो अल्ल बल्ल बकेन्गे, मीडिया के लिये मसाला होगा, इसे कोई नहीं रोक पायेगा / इनसे उसी भाषा में जवाब दिया जाना चाहिये

८- अन्ना हजारे जी का मूवमेन्ट गलत नहीं है / भ्रष्टाचार से सभी आहत है , मै भी हूं / अन्ना हजारे और उनके सभी साथी समझदार है और गान्धीवादी होने के नाते वे अहिन्सा में विश्वास रखते है / सिविल सोसायटी के लोग चाहते है कि भ्रष्टाचार इस देश से दूर हो / इसमें किसी को कोई एतराज नहीं होना चाहिये / सरकार को कुछ पाजिटिव और कुछ निगेटिव रूख अख्तियार करना चाहिये / अगर ये कहते है कि ड्राफ्ट मे इस बात का इन्क्लूसन करे तो इसमे क्या आपत्ति है ? एक बीच का रास्ता निकाल कर कुछ हासिल किया जा सकता है /

९- सरकार को यह सोचना चाहिये कि अभी बिल का ड्राफ्ट तैयार किया जा रहा है / इसमें किसी क्लाज को हटाने या कुछ नया जोड़ने का काम तो सन्सद के दोनो सदनों के अन्दर ही फाइनली होगा/ यह तो फिर सरकार के हाथ में होगा कि वह किस तरह का लोक्पाल बिल चाहती है /

१०- लोकतन्त्र मे सरकार टकराव का रस्ता नही अपना सकती / इस तरह का व्यवहार अराजकता को बढावा देता है /

हम दुनियां के सबसे बड़े लोकतान्त्रिक देश है / क्या हम दुनियां को यह सन्देश देना चाहते है कि लोकतन्त्र एक भ्रष्ट शाशन व्यवस्था है और इसमे खमियां ही खामियां है और इन खामियों को दूर करने का कोई रास्ता ही नहीं है ?

घोटाला करने वालों का देश

क्या अपना देश अब घोटाले दर घोटलों का देश कहलाया जाने लगेगा ?

वह दिन दूर नही लगता , जब यह देश घोटलेबाजों का देश कहलाया जाने लगेगा / हमारे देश के नेता ताल ठोंक कर घॊटाला पर घॊटाला किये जा रहे है और हम सभी तमाश्बीन की तरह बैठे हुये देख रहे है और कुछ कर नहीं पा रहे है / यह हमारे लिये असहाय की स्तिथि बन गयी है /

सरकार तो बिल्कुल उदासीन है और मौजूदा सरकार तो कतई चाहिती ही नहीं है कि इन सभी घॊटालों से पर्दा उठे / इतनी बडी बडी रकम के घोटाले हुये है कि दिमाग चकरा जाता है कि इस देश के नेताओं का हाजमा कितना अच्छा है कि वे इतनी बड़ी बड़ी रकमें हजम किये जा रहे है और डकार तक नहीं ले रहे है /

यह भ्रष्टाचार की पराकाष्ठा है / ताज्जुब की बात यह है कि इसे रोकने में किसी की भी किसी किस्म की कोई दिलचस्पी नहीं है, चाहे वह जनता हो, राज्नीतिक दल हों या इस देश का स्वतन्त्र मीडिया /

वजह बिलकुल साफ़ है, मामला पैसे सन्चय करने के सवाल से जुड़ा है / माले मुफ्त दिले बेरहम वाली मसल है / स्विस बैन्कों में जमा कई लाख करोड़ रुपया किसका है ? सब जानते है कि किसका पैसा है और कौन जमा कर रहा है, सरकार को सब पता है /

वास्तविकता तो यही समझ में आती है कि हमारे देश के नेता ही नही चाह्ते कि इस देश से भ्रष्टाचार दूर हो, बल्कि वे स्वयम चाह्ते है कि भ्रश्टाचार और ज्यादा से ज्यादा खूब फले फूले /

hello, kya aap mujhe dhanbal aur bahubal se grasit rajniti desh ke liye abhishap hai.is par apne vichar bata sakte hai.

हेलो, क्या आप धन बल और बाहु बल से ग्रसित राज नीति देश के लिये अभिशाप है , इस पर अपने विचार बता सकते है….???

यह सवाल एक बहन ने किया है /

राजनीति अगर किसी दबाव में रहकर सम्पन्न की जाती है, तो फिर राज नीति मे स्वतन्त्रता कहां रह गयी ? यह तो प्रेशर पालिटिक्स हो गयी / जबकि राजनीति में जितने भी निर्णय लिये जाते है, उनके बारे में हमेशा ही यही मान्यता रही है कि जो भी निर्णय लिया जाय वह हर तरफ से दबाव मुक्त हों ताकि किसी भी कोण से कभी भी आन्कलन किया जावे या देखा जावे तो हर एन्गल से सम लगे और बराबर एक सा लगे ? राज्नीतिक निर्णय सन्तुलित लगे /

धन बल पर आश्रित राजनीति धन के दबाव की राज्नीति है / मसल पावर की राज्नीति गुन्डागर्दी और मार काट के भय की राज नीति है, दहशत की राज्नीति है / दोनो ही प्रकार अनुचित और बेजा दबाव बनाते है / यह सब किसके फायदे के लिये किया जाता है ? यह आदर्श राज नीति कहां रह गयी ?

इस तरह की राज नीति न तो देश के लिये शुभ है और न इस देश की जनता के लिये शुभ लक्षण है /

अफ्सोस की बात यह है कि आनेवाले दिनों में पन्चायत से लेकर लोक सभा तक यही दोनो वर्ग यानी “धन बल” और “बाहु बल” का वर्चस्व बढेगा और इसे कोई नहीं रोक पायेगा / चाहे कितने भी कानून बना दिये जांय, इनकी फसल हमेशा बढेगी /

इस तरह के बलियों को केवल जनता ही रोक सकती है / लेकिन इसकी उम्मीद मुझे बिल्कुल नही लगती, क्योन्कि इस मसले पर जनता खुद ही एक नहीं है /

कब्जा करके बनाये जा रहे मन्दिर और धार्मिक स्थल ; मेरे साथ हुआ हादसा

सोमवार २० सितम्बर सन २०१० को मेरे मकान के सामने बार्डर लाइन के आगे २ फुट नाला की जमीन छोड़कर आस पास के अराजक तत्वों ने सामने ही स्तिथी एक पीपल के पेड़ के नीचे की जमीन घेर कर पहले एक चबूतरा बनाया और बाद में उस पर हनुमान जी की मूर्ती रखने का इन्तजाम किया जाने ही वला था कि तब तक मै वहं पहुन्च गया /

पीपल के पेड़ के नीचे की जमीन पर चबूतरा बनाने का कार्य क्रम कई दिनो से चल रहा था , लेकिन आस पास के किसी भी व्यक्ति ने मुझे खबर नहीं की /

मै कानपुर शहर में रहता हूं / जहा यह मामला हुआ वह मेरे घर से लगभग ५ किलोमीटर दूर का है , जहां मेरी पुश्तैनी जमीन है / मकान पुराना होने के कारण और सामने की दुकान खाली होने की वजह से मैने चार फ़ुट की दीवाल बना दी ताकि कोई अपनी समान न रख सके / इस दीवाल से बिल्कुल सटी हुयी नगर पालिका की बड़ी २ फ़ुट चौड़ी नाली है , जिस पर पत्थर रख दिये गये है / इसके बाद सरकारी जमीन है /

रात में मुझे लगभग ८ बजे किसी ने खबर की कि आपके घर के सामने कुछ लोग हनुमान जी का मन्दिर बना रहे है / सन्योग की बात है कि उसी समय एक सज्जन मेरे पास बैठे हुये थे, जैसे ही यह बात मैने उन सज्जन के सामने बतायी , उन्होने तुरन्त कहा कि आप अभी जाकर उस जगह का मुआयना करे / आप्की जमीन पर कब्जा होने जा रहा है / कल मन्गल वार भी है और बुढवा मन्गल होने से यह शक हो रहा है कि लोग आपकी जमीन पर कब्जा करके आपकी बिल्डिन्ग की रौनक खत्म करने पर तुले हुये है / आप अभी चलिये और देखिये की माजरा क्या है /

मै तुरन्त अपने बेटे के साथ और उन सज्जन को लेकर मकान की तरफ़ भागा / वहां जाकर सब देखा / चबूतरा बनाया जा चुका था / एक तरफ़ कुछ दूरी पर एक दुकान के पास हनुमान जी रखे गये थे/ पीपल के पेड़ पर एक लाल रन्ग की ध्वजा एक कील से ठोंक दी गयी थी /

मैने वहां उपस्तिथि लोगो से पूछा कि यह सब किसका काम है / यह सब किसी ने नहीं बताया कि यह किसका काम है / कुछ देर रहने के बाद मै थाना पुलिस पहुन्चा वहा तहरीर दी कि ऐसी वार्दात हुयी है / इस समय तक रात के साढे नौ बज चुके थे / थानेदार खाना खा रहे थे, उन्होने कहा कि मै अभी खाना खाकर द्स मिनट में आपके साथ चलता हू /

मै पुलिस लेकर अपने मकान आया और पुलिस ने मौका मुआयना किया / थानेदार ने कहा कि यह तो सन्ग्येय अपराध है / सरकारी जगह पर कानूनन ऐसे निर्माण करने का किसी को अनुमति नहीं है / उन्होने कहा कि रात काफी हो चुकी है अभी आप जाइये, कल दिन मे १२ बजे आइये/

मै वापस कानपुर चला आया, इस समय रात के ११ बजे के बाद का समय हो चुका था /

दूसरे दिन मै थाने पहुन्चा, थानेदार अपने बड़े अधिकारी के साथ मीटिन्ग कर रहे थे / क्योकि २४ सितम्बर की वजह से पुलिस अपने पुख्ता इन्त्जाम मे लगी हुयी थी / नागरिकों के साथ मीटिन्ग थी और नेताओं अधिकारियों का आना जाना तथा पुलिस का पुख्ता और सटीक इन्तजाम देखकर मै क्या सभी लोग दहसत में आ गये थे, लेकिन अपने अन्दर के मन में यह विश्वास भी भर रहा था कि किये जा रहे इन्तजाम से हम सभी नागरिक एक्दम सुरक्षित है और हम सब को बिना डरे अपने सभी काम उसी तरह से करना चाहिये जैसा हम रोज करते है /

अभी यह सब महौल थाने के अन्दर चल ही रहा था, सी०ओ० साहब पहले वहां से मीटिन्ग करके निकले, बाद में नेता गण और फिर धीरे धीरे सामान्य जन / मै लगभग दो घन्टे थाने के गेट पर खड़ा रहा और इन्तजार करता रहा कि कब मुझको अन्दर जाकर थानेदार साहब से मिलने का अवसर मिलेगा /

बहरहाल मै थानेदार साहब के सामने रक्खी हुयी कुर्सी पर बैठ गया, वे बहुत व्यस्त थे / आधा घन्टा बाद मेरी तरफ मुखातिब हुये / उन्होने कहा कि सार्वजनिक और सरकारी जगह पर कब्जा करना सन्ग्येय अपराध है /

मै कुछ देर बाद वापस कब्जे वाली जगह पर आया तो देखा कि किसी ने एक और हनुमान जी की पथ्थर की मूर्ती सीमेन्ट लगाकर रख दी है / मुझसे बर्दास्त नहीं हुआ, मैने अपने नौकर से कहा कि मै इन मूर्तियों को हटाये दे रहा हूं , तुम इस चबूतरे को तोड़ना शुरू करो / मेरे साथ मेरा बेटा भी था /

मैने एक झटके में हनुमान जी को उखाड़ा तथा दूसरे हनुमान जी को उठाकर नीचे रख दिया और हथौड़ा लेकर चबूतरा गिराना शुरू कर दिया / कुछ देर में ही वहा भीड़ लग गयी / बोला कोई नहीं / बजरन्ग दल के एक नेता आकर मुझसे पूछने लगे कि आप क्यों हनुमान जी का चबूतरा तोड़ रहे हैं ? मैने कहा यह अवैध है / मेरी उनसे बहस होने लगी / वे नेतागी्री दिखाने लगे / एक नेता विश्व हिन्दू परिषद के भी आ गये / वाद बिवाद जारी रहा / मैने काम नहीं रोका और बराबर चबूतरा तोड़ने में लगा रहा /

तभी किसी ने उन नेताओं से कहा कि कल रात में पुलिस आयी थी और पन्डित जी की लिखित तहरीर थाने में जमा है / यह सुनकर नेता जी खिसक लिये और फिर कोई लौट्कर नहीं आया / मैने उस चबूतरे को जमीन दोज करके बराबर कर दिया /

लोग कह रहे थे कि आपने सही समय पर जागरुक होकर अवैध निर्माण बनाने से रोका / जिस स्थान पर इस तरह का निर्माण हो रहा था वह कानपुर लखनऊ हाई वे है / ऐसे जाने कितने मन्दिर बन गये है जो हाई वे के किनारे किनारे बनये गये है /

मुझे बाद में पता चला कि इस सबके पीछे सफ़ेद्पोश नेताओं , नशेबाजों, स्मैकियों, पियक्कड़ॊ का हाथ था / ऐसे और इस तरह्से कब्जा जमाने वालों की नीयत कीमती जमीन पर कब्जा जमाकर उस पर दूकाने बनवाकर या जगह घेर कर रहने के साथ साथ कमाई का जरिया बनाने का होता है / धरम से उनका कोई लेना देना नहीं होता / जहां यह कब्जा हो रहा था, उसके १० कदम पर ही एक अच्छा खासा पुराना मन्दिर बना हुआ है / अगर सबको इतनी ही श्र्द्धा होति तो उनको पास के मन्दिर में जाना चाहिये था / इस तरह के नये मन्दिर बनाने क्या जरूरत थी /

वास्तविकता यह है कि देश को अगर इन सब बातों से बचाना है तो इसके नियन्त्रण के लिये कड़े कानून और सजा की जरूरत है /

कल्पना करें यदि मुझसे जरा सी भी चूक हो जाती और कुछ घन्टॊं का फरक पड़ जाता और अगर मै इस तरह के स्टेप न लेता, तो वहं मन्दिर बन जाता, तब क्या मै इस मन्दिर को हटा पता ? जवाब यही होता, शायद नहीं और कभी नही / यह पर्मानेन्ट बन जाता और फुट्पाथ पर कब्जा करके वहां दुकाने बन जातीं वही कब्जा जमाने वाले अपना घर बना लेते और रहने लगते / देश का कोई कानून इनको हटा भी नहीं सकता था /

जो मकान मालिक है, जिनकी जगहें खाली पड़ी है, वे सब बहुत सतर्क रहें / किसी की भी कीमती जमीन एक छोटे मन्दिर के कारण बरबाद हो सकती है / देश का कोई भी कानून इस कब्जे के सामने टिक नही सकता और इस मसले पर सभी न्यायालय चुप हो जाते है / कानपुर में ही हजारों ऐसी जगहें है जहं इस तरक के निर्माण रोजाना बड़ी सन्खया में हो रहे है और यह सिल्सिला थम नही रहा है / कही भी किसी भी सड़्क पर निकल जायें ऐसे निर्माण आपको बड़ी सन्खया मे देखने को मिलेन्गे /

सवाल यह है कि इस तरह के हादसे कब रोके जायेन्गे और इन्हे रोकेगा कौन? कानून तो बेकार हो चुका है /

क्या शान्ति की बात [करना] कायरता है ?

एक बहन ने यह सवाल उठाया है , मै इसे प्रश्न रूप में ही छोड़ देना चाहता था और इस प्रश्न का उत्तर देने के लिये मै यही इन्तजार कर रहा था कि शायद कोई पाठक इस पर अपने विचार रखे /

फिर भी मै जो भी सोचता हूं इस बारे मे, वह मै जरूर कहून्गा /

शान्ति की बात करना कोई कायरता नही है / न ही इसे कायरता के रूप में लेकर सोचना चाहिये / जब भी शान्ति की बात की जाती है , उसके कई मायने निकलते है / ये इस तरह के समीकरण होते है, जो देश , काल और परिस्तिथियों के अनुसार बनते और बनाये जाते है / इसके कूट्नीतिक अर्थ भी होते है / जो विश्व की राज्नीतिक स्तिथि, आस पास पड़ोस की सरकारों की सोच और मित्र तथा शत्रु तथा कौन साथ देगा और कौन नही, इन सब बतों पर निर्भर करता है / बहुत सी परिस्तिथियां इस तरह की बन जाती है, जहा पर सिवाय शान्ति की बात करने के अलावा दूसरा रस्ता ही नही बचता है /

हम कब तक किसी से लड़ सकते है, क्या यही एक काम हमारे पास होगा कि हम बराबर लड़्ते ही रहे ? क्या हमारे पास इस लड़ने के अलावा और कोई दूसरा काम ही नहीं है ? हम लड़ करके क्या हसिल कर लेन्गे या करेन्गे ? लडायीइयों से न तो कभी कोई फैसला हो पाया है और न कभी होगा ? लड़ायी तो खुद ही एक समस्या है, एक मसला है, इसलिये लड़ायी करके कोई यह सोचे कि वह कुछ कर लेगा, एक बच्चे जैसी सोच साबित होगी /

जैसा कि मैने पहले कहा है कि शान्ति की बात करना कायर्ता नहीं है बल्कि यह एक ऐसी सकारात्मक सोच है जिससे समाज और देश , हम और आप , उस प्रगति के मार्ग पर आगे बढने के लिये सुरक्षित महसूस करते है, जो केवल शान्ति के रास्ते से ही आती है / इसलिये शाति की बात करना एक सुरक्षा की गारन्टी का पहलू भी है जो सब्से जुड़ा है /