क्या यह “राष्ट्र” एक “दुकान” समझकर चलाया जा रहा है ?

पिछले कई माह से मै लगातार देखता और समझता चला आ रहा हूं कि क्या यह देश एक दुकान की तरह चलाया जा रहा है ?

मुझे तो यही समझ में आ रहा है / इस देश को दुकान की तरह चलाने वलों में मैने सर्कार में बैठे श्रेष्ठ दुकान्दारों को चिन्हित किया है /

इसमें सबसे आला नम्बर में हमारे लोक प्रिय हरदिल अजीज नेता आदर्णीय प्रधान मन्त्री सरदार मन मोहन सिन्ह जी, जिन्हे सारी दुनिया एक बेहतर अर्थ शास्त्री मान चुकी है और इसकी गवाह वे राष्ट्रिय और अनतर राश्ट्रिय विश्व विद्यालयों द्वारा अताह फरमायी गयी नाजिर डिग्रीयां है, वे पहले दुकान दार है जो दुकान चलाने वाले दल के मुखिया है /

नम्बर दो के दुकान्दार है श्री चिदाम्बरम जी, जिनके ऊपर किसी जमाने में एक सर्दार पत्रकार ने जूता का अक्स दिखा दिया था /

तीसरे नम्बर पर है सरदार मोन्टेक सिह अहलूवालिया और चौथे नम्बर पर है मराठा छत्रप श्री शरद पवार जी / अगर ये महिला होते तो इन्हे मै ललिता पवार से कतई कम न समझता /

यही सब मिलकर इस देश को एक दुकान की तरह चला रहे है /

किसी की कोई जिम्मेदारी नही, जो हॊ रहा है उसे होने दीजिये / सरदार जी ने यह कहकर सबकी हवा निकाल दी कि , महगायी को कम करना उनकी जिम्मेदारी नही है /

अब इन्हे कौन सम्झाये कि आदर्णीय इन्दिरा गान्धी कैसे महगायी को रोकने मे सक्षम थी ? कैसे इनके पूर्ववर्ती प्रधान मन्त्री अटल भिहारी वाजपायी जी ने महगायी पर लगाम लगायी थी ? उनके जमाने में आटा ७ और साढे सात रुपये किलो बिका था, आज बीस से बाइस रुपये किलो बिक रहा है /

सच यही है कि इस देश को एक दुकान की तरह चलाया जा रहा है, मन्मोहन सिह जी का अर्थ शास्त्र तो यही समझ में आता है ?

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