“सब्सीडी” समाप्त करने और “सब्सीडी” देने का सबसे अच्छा समय

भारत सरकार नागरिकों की सुविधा के लिये सब्सीडी यानी आर्थिक छूट देने के लिये अपने खाते से पेट्रोलियम पदार्थ यथा डीझल, पेट्रोल, रसोई गैस, यूरिया और अन्य खाद तथा इसके अलावा अन्य बहुत सी वस्तुओं पर छूट देती है / उदाहरण के लिये रसोई गैस की वास्तविक कीमत ७५० रुपये के आसपास बैठती है / लेकिन भारत सरकार इसे ४०० रुपये के लगभग नागरिकों को उपलब्ध कराती है / बाकी बचे ३५० रुपये के लगभग भारत सरकार अपने खाते से गैस का सिलिन्डर देने वाली कम्पनियों को भुगतान करती है / यह भुगतान करना ही “सब्सीडी” कही जाती है /

हकीकत और अमली जमीनी स्तर पर देखा जाये तो न तो गैस मिल रही है, न खाद मिल रही है और न डीजल समय पर मिलता है / ग्रामीण क्षेत्रों का हाल यह है कि खाद की बोरी में ३०० रुपये से लेकर ६०० रुपये तक की ब्लैक सीजन में किसानों को देना पड जाता है और सीजन में किल्लत हो जाती है सो अलग, यही हाल डीजल का है / सब जगह विक्रेता लूट मचाये हुये हैं , ताज्जुब की बात यह है कि इसे रोकने वाला कोई नही है / प्राशासनिक व्यवस्था इसलिये फेल साबित होती है , क्योंकि प्रशासन के अधिकारी खुद ही इस लूट खसोट में शामिल है और आपस में ही एक से दूसरे विभाग पर जिम्मेदारी डालकर नूराकुश्ती करते रहते है, क्योंकि घाघ और चालाक अधिकारी पैसा खीचना तो जानता है, लेकिन जिम्मेदारी और जवाब देही कोई नही लेना चाहता /

बहरहाल सरकार को “सब्सीडी” के लिये क्या करना चाहिये, मै अपने सुझाव दे रहा हूं /

१- सरकार द्वारा जितनी भी जहां जहां सब्सीडी दी जा रही है , उसे फौरन खत्म कर देना चाहिये /

२- जो लोग गैस का उपयोग कर रहे हैं या खाद ले रहे हैं या डीजल ले रहे हैं या कोई दूसरी वस्तु, सरकार अगर इसमें जितनी भी सब्सीडी देना चाहे तो “सीधे उपभोक्ता” को दे

३- सीधे उपभोक्ता को सब्सीडी देने से जहा घपला करने की गुन्जाइश है वह समाप्त हो जायेगी /

४- उपभोक्ता को रास्ट्रीय कृत बैन्क में खाता खुलवाना होगा

५- गैस कम्पनी, गैस वितरक या खाद वितरक या डीजल तेल वितरक या सूत वितरक समान का पूरा मूल्य जो निर्धारित होगा, वह उपभोक्ता से लेगा और उसकी खरीद की रसीद देगा /

६- इस रसीद के साथ वितरक एक “चालान” या “रसीद” या “मेमो” या “चेक” देगा जो इस बात को बतायेगा कि उसको कितनी “सब्सीडी” दी जा रही है / यह डाकूमेन्ट या प्रोसीजर कुछ इस तरह का भी हो सकता है जैसे अदालत में जमा पैसों को निकालने के लिये अदालत एक चेक या सनद जारी करती है, जिसे लेकर जिला ट्रेजरी या जिला कोषागार मे जमा करना पड़ता है और कोषागार एक चेक बैन्क के लिये जारी करता है, जिसे बैन्क के खाते मे जमा करते हैं और पैसा खाते में जमा हो जाता है /

७- कुछ इसी तरह का प्रोसीजर बनाकर सब्सीडी का पैसा सीधे उपभोक्ता को मिल जायेगा /

ऐसा कुछ करने से बहुत हद तक इन जिन्सों मे हो रही धान्धागर्दी को रोका जा सकता है /

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