पश्चिम बन्गाल की मुख्य मन्त्री ममता बनर्जी और उत्तर प्रदेश के मुख्य मन्त्री अखिलेश य़ादव और नेपाल राष्ट्र के नेता पुष्प कुमार दहल के बीच क्या समानता हो सकती है ???

बहुत सी समानतायें इन तीन नेताओं में मुझे नज़र आयी हैं /

१- ये सभी तीनों नेता अपने स्वार्थ के लिये जनता को बरगला करके पहले की सरकारो के खिलाफ झन्डा बरदारी करके और लोक लुभावन नारे बुलन्द करके सत्ता हथिया बैठे है /

२- वास्तविकता यह है कि तीनों नेता इस झन्डा बुलन्दी का काम करते करते ऐसी modus operandi आधारित नेता गीरी की राह बनाते हुये अपने को माहिर और expert समझने लगे कि अगर वे सत्ता में आये तो सब कुछ बदल कर एक ऐसी समाजिक और राज नैतिक और सान्स्कृतिक क्रान्ति कर देन्गे , जिससे सब कुछ उलट पलट हो जायेगा /

३-  यह सब करने के लिये इन सभी नेताओं को तत्कालीन सरकारों के खिलाफ वह सब करना पड़ा और इस तरह से जनता को दिखावा करना पड़ा कि अगर वे सत्ता में आये तो सब कुछ बदल कर रख देन्गे/ जैसे मुलायम सिन्घ का यह कहना कि ” अगर उनकी सरकार सत्ता मे आयी तो सभी पार्कों में लगे हुये हाथियों पर बुल्डोजर चलवा देन्गे” / प्रदेश की जनता आज तक बुल्दोजर चलने की राह देख रही है /  ऐसा कभी भी नही होगा और मुलायम सिन्घ क्या कोई भी देश का सर्वोच्च नेता भी आ जाय तो भी वह ऐसा कभी करेगा भी नही और कर भी नही पायेगा / इसका कारण यह है कि हाथियों और पार्क का निर्माण बिना कैबिनेट के approval  कोई सरकार नही कर सकती और फिर fund  की बात होती है , यह सब sanction सरकार को ही करना पड़्ता है और जहां सरकारी पैसा लगा हो , वहां की सारवजनिक सम्पत्ति क्या कोई भी व्यक्ति या नेता अपनी मन मर्जी से  बुल्डोजर चला कर ध्वस्त कर सकता है ?   यह सरकार के काम करने के  procedure  है /

लेकिन देश या प्रदेश की जनता यह सब नही जानती /जनता के पास  इतना सोचने और समझने का दिमाग  नही है , जिस देश या प्रदेश की जनता मानसिक गरीबी और आर्थिक गरीबी और सान्स्कृतिक गरीबी और शारीरिक गरीबी तथा अन्य गरीबियों से जूझ रहा हो  वहां ऐसी जनता के पास यह सब सोचने का समय कहां है / यही बात भीड़ तन्त्र को बढावा देता है / फलाना भले ही उनको कुयें में ढकेले दे रहा हो लेकिन इस तरह की मान्सिकता वाली जनता उनको कुयें में  ढकेले  जाने वाला ही सबसे बेहतर नेता समझ में आता है / भले ही वह उनको चूस चूस कर नन्गा कर रहा हो लेकिन जनता उसी के पीछे भागती है और उसको अपना आका समझती है /

इसी मानसिकता का फायदा ममता बनर्जी और अखिलेश यादव और पुष्प कुमार दहल “प्रचन्ड” ने उठाया और अपने एक सूत्री कार्यक्रम “नेता ह्टाओ” या “राजा हटाओं” के नारे को बुलन्द करके अपना मकसद पूरा करनें में कामयाब हो गये /

लेकिन इस तरह की कामयाबी  यानी सत्ता पलटने के बाद और कुर्सी मिलने के बाद ये नेता फेल क्यों हो गये या क्यों हो रहे हैं ? इस तीनों मे एक समानता का लक्षण यह भी है /

[3] नेपाल के राजा ग्यानेन्द्र को हटाने के लिये पुष्प कुमार दहल “प्रचन्ड” माओ वदियों को लेकर नेपाल में गुल गपाड़ा मचाये हुये थे / कैसे राज साहब को हटाया जाये और अपनी सत्ता स्थापित की जाये, इसी उधेड़्बुन में उनकी सारी ताकत और सारी मानसिक उर्जा का क्षरण हुआ / मै पुष्प कुमार दहल “प्रचन्ड” से एक बार नेपाल में काठ मान्डू के किसी स्थान पर मिल चुका हूं, यह सन १९७६  के आस पास की बात होगी , जहां तक मुझे याद आता है / अब जब किसी तरह सत्ता मिल गयी  तो उनका राजा को हटाने का जो भी मकसद था , वह पूरा हो गया यानी उनका उद्देश्य पूरा हो गया / इसी के साथ उनके सामने यह नयी समस्या आयी कि अब क्या किया जाये ? सत्ता कैसे समभाली जाय ? यह वह सवाल था जिसके बारे में इन नेताओं को कोई अनुभव नही था कि सत्ता चलायी कैसे जाती है ? इनके पास सत्ता चलाने का कोई दिमाग नही था  और हल भी नही कर सकते थे / यह सवाल एक दम नया था , यह एक ऐसी पेचीदा जिम्मेदारी अचानक इन नेताओं के कन्धे पर आ गयी , जिसको सम्भालने के  लिये वे तैयार नही थे / उधर जनता का दबाव बढता जा रहा था / ऐसी स्तिथि के सामना करने के लिये  और समाधान के लिये प्रचन्ड तैयार नही थे / नतीजा यह निकला कि अपने प्रचन्ड स्वभाव के कारण , जिसके लिये वह काठ मान्डू विश्व विद्यालय में प्रसिध्ध रहे हैं, स्तिथि सम्भाल नही पाये और इसका नतीजा यह निकला कि आज देखिये नेपाल की हालात क्या हो गये हैं ? यही हाल हमारे देश के दो राज्यों के सत्ताधारियों का भी  हुआ/

[४] सभी काम बिना धन या पैसे या सन्साधनों के बगैर नही हो सकते हैं / सरकार चलानी है , शाशन चलाना है, राज्य के जन सेवार्थ सन्साधन जुटाना है तो इसके लिये पैसा चाहिये / ह्हर काम के लिये पैसा चाहिये / तभी काम हो सकता है / गाल बजाकर और शब्द की बौछार करके न तो किसी का पेट भरेगा और न किसी कि तनख्वाह आयेगी / सरकार चलानी है तो पैसा चाहिये / लेकिन यह आयेगा कैसे ????? / भाषण देने में कोई गरीबी नही / कहा भी गया है “वचनम किम दरिद्रता” अर्थात बोलने में क्या गरीबी है ? आपका मुख है , आपकी उर्जा है, आपका गला है, अपका टेटुआ है , आपका सोच है आपकी ताकत है , आपका स्वर है , सब कुछ आपके पास है , जितना चाहे उतना बोलिये, अब इस तरह से बोलने में भी क्या गरीबी  है ?  बाते है , बातों का क्या? ये सभी नेता बातें करके ही सत्ता तक पहुचे हैं , यह नही भूलना चाहिये /  ममता बनर्जी ने देश के सबसे ईमान् दार और करमठ व्यक्ति रतन टाटा को सिन्गूर और नन्दी ग्राम से उनकी दुर्दशा करके राज्य से बाहर निकाल कर कोई बहुत अच्छा और उल्लेखनीय काम नही किया / रतन टाटा को जिस तरह से  ममता बनर्जी ने हटाकर अपने  कारनामों और कलाकारी   करके  भले ही वे सत्ता में आ गयी हों  और कम्युनिष्टॊं को उखाड़ फेन्का हो, लेकिन यह सब टाटा जैसे उद्योगपति को मुख्य मोहरा बनाकर और विलेन बनाकर हासिल की गयी कवायद से सीधे सीधे जुड़ा है / इसका नकारात्मक प्रभाव यह पड़ा कि पश्चिक बन्गाल में कोई भी उद्योगपति अपना पैसा या काम लगाने को तैयार नही / यहां सवाल  सरकार की credibility  और surety से जुड़ा है / कोई अपना पैसा क्यों बन्गाल में लगाये ? यह सब ममता बनर्जी का ह्ठ और उनकी मान्सिकता से जुड़ा है जो प्रजातान्त्रिक उसूलों से कतई नही मेल् खाता है, यह अधिनायक वादी मान्सिकता है / आज क्या हालात है बन्गाल के , सभी जानते है / अखिलेश यदव का भी यही हाल होगा / आदि गो्दरेज का बयान ही इसके लिये काफी है कि “पहले अपना इन्फ्रास्ट्रक्चर सुधारिये”
 

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