देश के मीडिया और इलेक्ट्रानिक चैनलों में “बुल बुलें” लड़ाने का मौसम

बुल बुल एक नाजुक सा पछी है , एक नाजुक सी चिडिया, देखने मे सुन्दर , काला रन्ग, नीचे के रोयें कुछ लाल रन्ग के, अवाज बहुत सुहानी, “पिट पिटो” “पिट पिटो” जैसी आवाज छोटी छोटी चोचो से निकल कर आती है, तो मन को हर लेती है /

बचपन में हमारे मुहल्ले मे लोगों को बुल बुल चिड़िया को पालने का शौक था / सैकड़ो हजारों की सन्ख्या मे लोग बुल बुल पालते थे / लोहे की सरिया से बने अड्डे जिन पर कपडे़ का मुलम्मा चढा होता था , उस पर बुल बुल चिडिया बैठी रहती थी / हम बहुत उत्सुकता के साथ उसको देखा करते थे /

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चिड़ी मार कभी कभी हमारे मुहल्ले के पास उन दिनों स्थापित बागीचों में बुल बुल पकड़्ने के लिये आते थे / ये चिड़ीमार किस तरह चिडिया पकड़्ते थे, यह सब देखने के लिये भारी सन्ख्या मे लोग इकठ्ठे हो जाते थे , और एक हुजूम सा इकठ्ठा हो जाता था / हमारे लिये यह बहुत कौतूहल की बात होती थी कि बुल बुल का शिकार या बुल बुल को पकड़्ने में कितनी और कौन कौन सी कलाबजियों और तरकीबो का इस्तेमाल किया जाता है /

सबसे जयादा मजा हम लोगों को बुल बुलों की लड़ाई देखने में आता था / आये दिन मोहल्ले में बुल बुल लड़ाने के competition  हुआ करते थे / बुल बुलो की लड़ाई देखने मे बड़ी भीड़   जम जाती थी / बुल बुलें पालने वाले खाने का चारा दिखाकर बुल बुलॊ को लड़ाते थे / लड़ाई में यह महत्व पूर्ण नही था  कि कौन जीता या कौन हारा, लड़ाई में यह महत्व पूर्ण था कि बुल बुलो की कलाबाजी कैसी है , पैतरे कैसे है, stamina  कैसा है आदि आदि /

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यह तो थी बचपन की बात / अब तो धीरे धीरे बुल बुलों का पालने और उनको लड़ाने का शौक खत्म हो गया  है , और इधर कई साल से बुल बुलें भी देखने मे नही आ रही है / ऐसा लगता है कि अब न तो बुल बुल पालने का शौक किसी को रहा और न उनको लड़ाने का /

लेकिन बुल बुलो की लड़ाई जैसा  वातावरण और नया स्वरूप इलेक्ट्रानिक चैनलों में देखकर , फिर से याद ताजा हो गयी कि बुल बुल न सही बुल बुलो जैसी लड़ाई देखने का मजा अब इलेक्ट्रानिक चैनलों ने पैदा कर दिया है , जिनमें बुल बुलें तो नही , विभिन्न प्रकार के मानव रूपी बुल-बुली नेता, पत्रकार , विशेष्ग्य, और न जाने कौन कौन से स्वयम्भू  experts  एक साथ पैनल बनाकर  और बुल बुलों को लड़ाने जैसा मानव एन्कर द्वारा कोई न कोई सवाल रूपी फुल्झड़ी या सवाल रूपी चारा छोड़ते हुये आपस में “फिट पिटो”  पिट्पिटो” जैसा जोश भरते हुये आपस में ही एक दूसरे को वाक-युध्ध और कटाजुध्ध जैसी लड़ाई को कराने का मैदान बना देते है और आपस मे ही एक दूसरे की “पिट- पिटो”  को कराते रहते है /

इस तरह की पन्चायत और झन्झट करने की कवायद से क्या नतीजा मिलता है ? इसे समझना बहुत दुरूह कार्य है / Times Now चैनल के बुल-बुल लडैत किसी भी समस्या का समाधान पाने के लिये जब दूसरी वहां मौजूद देशी और विदेशी बुल बुलों से सवाल करते हैं और जब दूसरी बुल बुल जैसे ही उत्तर देना शुरू करती है , वैसे ही बुल बुल लडैत उनकी जबान पर लगाम लगा देता है और बोलने नही देता , जोर जोर से हाथ हिलाकर इधर उधर गर्दन मे झटके देकर  खुद ही कसूर वार साबित करने की कोशिश करने लगते है / जब तक जवाब देने वाला अपनी बात पूरी करे, बुल बुल लडैत उनकी ही जबान बन्द कर देता है /

लगभग सभी इलेक्ट्रानिक चैनलों में बुल बुल लड़ैत किसी न किसी मुद्दे को लेकर कई बुल बुलों को बैठाकर आपस मे चारा दिखाकर कर “पिट पिटो ” “पिट पिटो” कराया करते हैं / इस तरह की वाक वाचालता से क्या हासिल होता है, यह तो  चैनल वाले जाने / पत्रकारिता की इस तरह की नई विधा  से मीडिया  जनता को क्या बताना चाहता है ? क्या सन्देश  जनता को मिलता है ? मानव मनोवैग्यानिक तथा मानव स्वभाव चाहता  है कि उसकी उत्सुकता का थोड़ा सा appeasement  हो , वह शायद इस तरह की वाक युध्ध और वाक्पटुता को प्सन्द करता है / फिर भी  मुझे नही लगता कि इस तरह की कवायद से जनता पर कोई गहरा असर पड़्ता हो या केन्द्र अत्र्हवा राज्य सरकार या सरकारें बहुत सन्जीदा होती हो /

हां, चैनलों द्वारा प्रायोजित इस  तरह की बुल बुल लड़ाने की प्रक्रिया या BUL BUL FIGHT  को “दिमागी अय्याशी  करने का अड्डा” जरूर कह सकता हूं / जहां कुछ खास “घडियाली दिमाग” वाले ही इक्ठ्ठा होते है , बोलते है, opinion देते है , लेकिन ये जो भी कहते है, बोलते है , वह सब आम जनता की बात नही होती /

इसे कुछ ऐसे समझना चाहिये कि जिस विषय की बुल बुल चर्चा की जा रही है  , वो चर्चा पैनल द्वारा भटक कर “सिर दर्द मुर्गे को क्यों हुआ “ की ओर भटक कर मुड़ जाती है  और  फिर इस बारे में वाक युध्ध जोर शोर से  होने लगता है /  जबकि इस वाक युध्ध के केन्द्र में असली मूल मुद्दा, जिस पर वास्तव मे चर्चा होनी चाहिये थी, वह  है “कुत्ते की बवासीर का इलाज कैसे किया जाय “, जिसकी कोई  पैनलिस्ट चर्चा तक नही करता है /

मैने देखा है कि बहुत इन्टीरियर में बसे सुदूर गावों मे और ग्रामीण और कस्बाई इलाकों में , जहां आना जाना भी बहुत मुश्किल भरा काम है, वहां अधिकतर लोग FREE AND UNPAID ELECTRONIC   CHANNEL यानी मुफ्त और बिना पैसा  देने वाले चैनल देखते है / इसके लिये लोगों ने अपनी छतों पर DISH ANTENNA  लगा रखे है / २ या तीन प्रतिशत लोग paid channel देखते है / लेकिन बिजली के  न रहने पर और समय कुसमय पर बिजली के आने जाने से  टी०वी० चैनल  लोग नही देख पाते हैं / रेडियो सुनने का रिवाज बहुत कम हो गया है , फिर भी जिन्हे उत्सुकता होती है , वे रेडियो सुनते हैं / अधिकतर ग्रामीण और कस्बाई लोग नाटक, सोप ओपेरा, ड्रामा और बालीवुड के प्रोग्राम देखते हैं /टी०वी० चैनलों द्वारा प्रस्तुत की जा रही बुल्बुलों की लड़ाई जैसे कार्य क्रम BULBUL FIGHT जैसी पन्चायत  इन क्षेत्रों में कोई नही देखता है, इसका कारण है कि गावों मे इस तरह की पन्चायत आम है और ग्रामीण इलाकों की राज्नीतिक दॄष्टिकोण की सोच के समीकरण देश के शहरों की अपेक्षा गावों की परिस्तिथियों से बिलकुल जुदा होती  है /

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