अन्ना हजारे और जन-लोक पाल और मह्त्वपूर्ण पैदा हुयी तत्कालीन परिस्तिथियां

दो साल के बीत चुके समय के लगभग का,  देश के मन्जर का क्या हाल था, थोड़ा याद करिये /  एक ७५ साल का बूढा आदमी  राम लीला मैदान में इसलिये भूखा रह कर  अनशन पर डटा पड़ा  था , ताकि इस महान देश को भ्रष्टाचार से खोखला बनाये दे रहे लोगों से आम जनता को छुटकारा मिल सके /   सरदार मनमोहन सिन्घ की सरकार ने इस बूढे आदमी, जिन्हे सारा विश्व “अन्ना हजारे” के नाम से जानते हैं , को तिहाड़ जेल मे बन्द कर दिया , इसलिये कि इस देश का कोई व्यक्ति भ्रष्टाचार के खिलाफ  आवाज न उठा सके / केन्द्र सरकार मे बैठे सरकार के मन्त्रियों और नेताऒ ने अन्ना की खूब खिल्ली उड़ाई /

कान्ग्रेस के प्रवक्ता मनीष तिवारी ने तो मीडिया मे आकर कह दिया कि “अन्ना तुम सर से लेकर पैर तक भ्रष्टाचार मे डूबे हुये हो” / सन्सद के अन्दर हो रही बहस में सभी पार्टियों के नेताओं ने इस देश की जन्ता को ललकारते हुये चुनौती देना शुरू किया , जिससे यह सन्देश इस महान देश के अन्तिम स्तर के व्यक्ति तक पहुन्च गया कि नेता तो भ्रष्टाचार करेगा और इसे जो रोकेगा उसे वे खत्म कर देन्गे /

दो साल के अन्तराल में बहुत कुछ बदल गया / अन्ना भी अपनी गिरती सेहत से परेशान होने लगे, इलाज के लिये कई बार अस्पताल में भर्ती हुये, ७५ साल की उमर और उस पर उपवास की मार , आखिर शरीर है , कब तक साथ देता है , यह तो ऊपर वाला ही जाने /

४५ साल के लगभग बीत चुके , जिस लोकपाल को सरकार ने ठन्डे बस्ते में डाल दिया था, अचानक सुर्खियों मे कैसे आ गया ? आनन फानन मे पास होने के लिये क्यों सभी राजनीतिक दल राजी हो गये ?

मेरा आन्कलन कुछ इस प्रकार है / मै इसे कुछ अलग नजरिये से देखता हूं /

[१] सबसे पहले तत्कालीन परिस्तिथियां कैसी बन रही थी / इसे समझिये / जन लोक पाल के आनन फानन मे पास करने का सबसे बड़ा कारण रहा चार विधान सभाओं के चुनाव के नतीजे, जिनमे सबसे ज्यादा मुह की खानी पड़ी कान्ग्रेस पार्टी को / कान्ग्रेस पार्टी का सूपड़ा साफ हो गया / यह कान्ग्रेस के लिये immediate चिन्ता की बात हुयी /

[2] सबसे high pressure  अधिक दबाव लगभग सभी राज्नीतिक दलों को मानसिक और सामाजिक रूप से “आम आदमी पार्टी” का पड़ा, जिसने सबके आन्कलन को धड़ाम करते हुये दिल्ली की ७० विधान सभा सीटों मे से २८ सीटें जीतकर  सबको चौन्का दिया  / इस अप्रत्याशित घटना से सभी राज्नीतिक दलों की नीन्द उड़ गयी और उनको खतरा मह्सूस होने लगा कि अगर जल्दी ही कुछ नही किया गया तो फिर सारे देश मे आम आदमी पार्टी ही नजर आयेगी / जिस तरह की कार्य प्रणाली से सारे देश के लोग “आप” से प्रभावित हुये, उससे राज्नीतिक दलों मे खलबली मचना स्वाभाविक था/

[३] दूसरी तरफ अन्ना हजारे ने अनशन करने का विचार किया / क्योकि कि वह सरकार के वादों से बहुत ज्यादा नाखुश थे /  सन्सद का अंतिम सत्र आ गया लेकिन लोक पाल पर कोई चर्चा तक नही हुयी / अन्ना ने दिल्ली की बजाय अपने गांव राले गण सिध्धि में अन्शन करना शुरु किया / इसके पीछे मुझे यह लगता है कि शायद ७५ साल के अन्ना   अब यह विचार कर चुके थे कि उनको अपना “बलिदान”  देना है, इसीलिये उन्होने कहा था कि अगर मुझे कोई जबर्दस्ती करके जेल मे डालेगा तो वे पानी तक पीना बन्द कर देन्गे / खराब सेहत के कारण अन्ना कब तक  जीवित रह सकते  थे ?  यह सबके लिये चिन्ता की बात थी / आखिर अन्ना ठहरे भारतीय फौज के एक सिपाही , जो मौत के मुह मे  जाते हुये अपने सभी साथियो को पलक झपकते देख चुके थे और इस घटना मे यही अकेले जीवित  बचे थे / उनके दिमाग मे शायद यह बात आ गयी हो कि एक अच्छे काम के लिये अथवा एक सार्थक उद्देश्य के लिये अगर उनके प्राण चले जाते हैं तो यह देश के लिये सर्वोच्च बलिदान होगा /

[४] नरेन्द्र मोदी कान्ग्रेस पार्टी पर लगातार हाबी होते जा रहे  है/ रिटायर्ड फौज के जनरल बी० के० सिन्ह अन्ना के आन्दोलन से जुड़े हुये हैं / अन्ना को पेन्शन और दूसरी सुविधायें भारतीय फौज की तरफ से मिल रही है, जब तक वह जीवित है / जनरल साहब अभी भी उनके अधिकारी है , भले ही वह रिटायर हो गये हों , लेकिन फौज का सिपाही अपने अधिकारी के हुक्म को मानने के लिये  हमेशा तैयार रहता है / भले ही उसकी उमर कितनी भी क्यों न हो गयी हो ? इसीलिये जब आप के नेता गोपाल राय ने राले गण सिध्दि मे जनरल साहब के खिलाफ कुछ कहा था तो अनुशासित सिपाही अन्ना को यह बहुत बुरा लगा होगा कि उनके  सर्वोच्च अधिकारी  की बेइज्जती की जा रही है और इसी बात से खफा होकर अन्ना ने गोपाल राय को राले गण सिध्धि गांव से चले जाने के लिये कहा था/ इधर नरेन्द्र मोदी हाबी हो रहे थे, उधर तत्कालीन परिस्तिथियां कान्ग्रेस पार्टी  के प्रतिकूल जा रही थी / आम जन्ता बेहद खफा थी /

[५] कान्ग्रेस पार्टी की दिल्ली मे  छीछालेदर और हार का मन्जरे-हाल देखकर और देश  की जनता के बदलते मूड को देखकर अन्य दूसरे राज्नीतिक दलों को यह भय सताने लगा कि अगर कहीं २०१४ के लोक सभा चुनाव मे “आप”  भारी बहुमत को लेकर सन्सद में पहुन्च गयी तो उनका भविष्य क्या होगा ? खुदा न खास्ता कहीं अन्ना जी को कुछ हो गया तो इनकी सबकी राज्नीतिक दुकानें बन्द होने मे देर न लगेगी ?

[६] यह सही है कि सन्सद के अन्दर बैठे लोग कतई नही चाहते थे कि लोक पाल बिल को इसी अन्तिम सत्र मे लाया जाय / अगर अर्विन्द केजरीवाल की पार्टी “आप” को दिल्ली की जनता इस तरह का जन समर्थन न देती / आन्कड़ों को देखे तो अरविन्द केजरी वाल की पार्टी के बहुत से कन्डीडेट लगभग ५००  वोटों से लेकर २००० वोटों के बीच मे हारे हैं / अगर यह जीत कर आते तो यही अकेले सरकार बनाने के लिये काफी थे / सपा और बसपा का तो सफाया हो गया / बसपा की नेत्री बहन मायावती जी ने ही सबसे पहले मीडिया के रास्ते से यह कहा था कि ” अगर अन्ना को जन लोक पाल लाना है तो वह चुनाव लड़्कर आये और अपनी मर्जी का लोक पाल बना लें ” , जिस समय अन्ना हजारे का राम ळीला मैदान में उपवास चल रहा था / यह नेताओं का अहन्कार भरा व्योहार याद करिये / इससे इस महान देश के अन्तिम व्यक्ति तक यह सन्देश पहुन्चा कि ” न नौ मन तेल होगा और न राधा नाचेगी” यानी जब रास्ता ही नही बनेगा तो लोक पाल कहा से आयेगा / जब लोक पाल नही बनेगा तो फिर भ्रष्टाचार कैसे दूर होगा / वास्तविकता यह थी कि आम जनता के पास कोई अन्य लोकतान्त्रिक और सही विकल्प नही था / घूम फिर कर कान्ग्रेस या भाजपा अथवा क्षेत्रीय दल जैसे ्सपा, बसपा, डी०यम० के० , तेलगू देशम, तृण्मूल कान्ग्रेस, अगप, ADMK आदि आदि, देश की सारी राज्नीति इन्ही दलो तक सिमट कर रह गयी थी / “आप” पार्टी के आने से लोगो को समझ मे आया कि इन्को भी एक मौका देना चाहिये / निष्कर्ष यह कि देश की जनता को देर से समझ मे आया कि सभी दल उसको लूट रहे है और सभी दल भ्रष्टाचार मे डूबे हुये है, चाहे वह किसी भी रुप में हो /

जन्ता का बदलाव भाम्प कर ही सभी राज्नीतिक दलों की चेतना जागी और उनको मजबूर होना पड़ा कि लोक पाल को पास किया जाय /

[७] लोक सभा का चुनाव २०१४ मे होना है  / राज्नीतिक दलों के पास क्या चेहरा होगा, क्या मुख होगा, जिसकी वह उपलब्धियां गिनाकर वोट मान्गेगे / किस जबान से कहेन्गे कि उन्की पार्टी को वोट दो / यह एक और भविष्य मे आने वाला खतरा राज्नीतिक दलों को महसूस हो रहा है /

[८] कान्ग्रेस को लगा कि भ्रष्टाचार का मुद्दा कही नरेन्द्र भाई  मोदी अपने खाते मे न कर लें / जनरल बी० के० सिन्ह अपरोक्ष रूप से इसी दिशा मे सक्रिय थे / अन्ना हजारे को रिटायर्ड जनरल से  moral support  मिलने से अन्ना का हौसला बढा हुआ था / अन्ना ने दिल्ली की बजाय राले गण सिध्धि मे अनशन करने का मन क्यों बनाया, इस्का केवल कयास लगाया जा सकता है ? ्पहला कयास यही है कि अन्ना द्वारा किये जा रहे अन्दोलन की गर्मी का पारा  नीचे की ओर जा रहा था / देश मे निराशा का माहौल था और लोग मान चुके थे कि लोक सभा जिस बिल को ४५ साल तक लटकाये हुये बैठी है , यह शायद ऐसा ही बना रहेगा / अन्ना चाहे जितना अन्दोलन कर ले , यह सरकार कतई नही चाहेगी कि ऐसा कोई बिल या कानून बनाया जायेगा / याद करिये , जब यही मन्मोहन सिन्घ की सरकार के मन्त्रियों और सान्सदों और दूसरे दलों के नेताओं के कान बहरे हो गये थे और कुछ भी सुनना नही चाहते थे, अन्ना राम लीला मैदान में अन्शन कर रहे थे , उधर सरकार बहरी बनी हुयी बैठी थी और कुछ भी कह्ना और सुनाना नही चाहती थी, तब अन्ना ने ललकारते हुये समरथकों से कहा था कि सान्सदों और मन्त्रियों को घरो पर धरना दो और उनका घेराव करो / इतना सब करने पर भी सरकार ने कुछ नही किया, इसीलिये अन्ना जी ने जब फिर से अनशन का रास्ता चुना तो उनकी तबीयत भी खराब हुयी / अन्ना को जितना समर्थन की उम्मीद थी, वह भी नही मिली / लोगों मे निराशा की भावना पैदा हुयी /

[९] यह सही है कि “आप” राज्नीतिक पार्टी अगर इस तरह का चुनावी धमाका नही करती तो शायद स्तिथि दूसरी होती और यह बिल कतई पास होने वाला नही था / यह तो अच्छा हुआ कि “आप” के राज्नीतिक कान्सेप्ट को भाम्पकर सभी राजनीतिक दलों के पैर और सभी पैतरे उखड़ गये , सभी को लक्वा मार गया / सभी नुकसान में पहुन्च गये / इस नुकसान की भरपायी के लिये ही राज्नीतिक दलों मे सहमति बनी और बिल पास हुआ /

[१०] ऐसा समझ मे आया है कि आप पार्टी के फिल्हाल दिल्ली मे काबिज होने के बाद साफ सुथरी राज्नीति चाहने वालों के बीच मे पूरे देश मे एक अच्छा सन्देश गया है कि राज्नीति की गन्दगी को अगर दूर करना है तो इस गन्दगी मे साफ सुथरे लोगों को उतरना होगा, जो वास्तव मे देश के लोगो की सेवा करना चाहते है / यह सन्देश खतरनाक है , ऐसा शायद देश के नेताओं ने समझा और महसूस किया होगा और भी सभी दल समर्थन के लिये राजी हुये होन्गे /

मेरा यही मानना है कि अगर “आप” का झटका और अन्ना की सेहत  और अन्शन से पैदा परिस्तिथियां और उसके बाद पड़ने वाले प्रभाव आदि का असर न होता तो शायद  जैसा टालमटोल कान्ग्रेस सरकार की तरफ से किया जा रहा था , वह जारी रह्ता और भविष्य में कैसा और कब लोक पाल पास होता , यह सब भविष्य के गर्त में होता / यह तो एक प्रकार की अचानक तत्कालीन परिस्तिथि बनी , जिसके परिणाम सबके सामने हैं /

यह अन्ना हजारे का बड़प्पन कहना चाहिये कि कान्ग्रेस की मनमोहन सरकार ने जितना कष्ट और दिक्कत अन्ना हजारे को पहुचाई है, उन्होने इन सबका मलाल न करते हुये ,राहुल गान्धी और सोनिया गान्धी को विशेष तौर पर लोक पाल पास करने के लिये बधाई दी है , जिन सान्सदों ने उनकी खिल्ली उड़ाई, जिन नेताओं ने उनकी मजम्मत की उन्होने उन सबका शुक्रिया अदा किया /

अभी तक का मेरा अनुभव यही समझता है कि मौजूदा पास किये गये लोक पाल के मसौदे पर बहुत सी बाधायें आयेन्गी , क्योकि इसे राज्यों को लागू करना है / राज्य इसे कैसे लागू करते है और किस सवरूप मे लागू करन्गे, यह तो राज्य के नेता तय करेन्गे / मुझे नही लगता कि इस मौजूदा लोकपाल से किसी भी भ्रष्टाचारी  नेता को सजा मिलेगी / इसमे  बच निकलने की गुन्जाइश बहुत होगी / अरविन्द केजरीवाल इसे “जोक पाल” अगर कहते है और यह भी जोड़्ते हैं कि इससे तो एक चूहे को भी सजा नही हो सकती तो इसमे मुझे कुछ सच्चाई नजर आती है /

 

 

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