कान्ग्रेस के महात्मा गान्धी और भारतीय जनता पार्टी के महात्मा गान्धी और आम आदमी पार्टी के महात्मा गान्धी

स्वरज००१हमेशा यही देखा जाता है कि जब कान्ग्रेस पार्टी को कोई फायदा उठाना होता है चाहे वह सियासी हो या कुछ और दूसरा , पार्टी हमेशा ऐसे समय पर बापू यानी महात्मा गान्धी को अचानक याद करने लगती है / चाहे उसका मर्म सम सामयकी से सीधे सीधे महात्मा गान्धी से जुड़ा हो या न हो और उसका कोई मतलब हो या न हो / चुनाव आ रहे है अब कान्ग्रेसियों को महात्मा गान्धी याद आने लगेन्गे और इलेक्शन बाद बापू यानी महात्मा गान्धी को भूल जायेन्गे / हमेशा यही होता है / अब तो नई पीढी असली महात्मा गान्धी को ही भूल चुकी है / लेकिन नये गान्धी के अवतारों को देश के नवजवान लोग महात्मा गान्धी के परिवार का ही समझते हैं /

हिन्द स्वराज की कल्पना कैसी होना चाहिये, इसका खाका महात्मा गान्धी जी ने अपनी पुस्तक के विचारों के द्वारा लोगों के बीच मे पहुचाई है / यह पुस्तक सन १९०८ मे पहली बार प्रकाशित होकर आयी थी / उस समय देश अन्ग्रेजों का गुलाम था / राज शाही देश मे व्याप्त थी / शायद यही कारण था , जब महात्मा जी ने यह विचार लिखे होन्गे तो उस समय के तत्कालीन राजा महाराजाओं ने क्या समझा होगा ? यह बात कैसे मूर्त रूप मे होगी, कौन पसन्द करेगा और कौन न पसन्द करेगा ?

बहुत से सवाल उस समय के अनुत्तरित है और किसी को भी शायद न पता हों / लेकिन सरदार पटेल ने जिस तरह की व्य़ूह रचना की और यह “प्रीवी पर्स” का झान्सा दिया गया होगा , जिसमे राजा महाराजाओं को साला्ना  कुछ रकम और कुछ अधिकार दिये गये थे, जिस कारण राजा महाराजा अपनी रियासत राज्य का विलय भारतीय सन्घ मे करने को तैयार हुये होन्गे /

लेकिन कुछ घटनायें ऐसी हुयी जिनसे कान्ग्रेस पार्टी का चरित्र और चाल और विश्वसनीयता कमजोर होती चली गयी / सबसे पहले देश को स्वतन्त्रता दिलाने वाले महात्मा गान्धी जी ही कान्ग्रेस के लिये बोझ बन गये, क्योकि वह जो कहना और करना चाहते थे , उसकी तरफ कोई ध्यान देने वाला ही नही था /  कुछ साल बाद कान्ग्रेस ने भारत मे रियासत  विलय  करने वाले राजाओं का प्रीवी पर्स अचानक समाप्त कर दिया और इसके साथ ही उनके विशेष अधिकार भी समाप्त कर दिये गये , यह सब मोहतरमा इन्दिरा गान्धी ने किया / इन राजाओं के प्रीवी पर्स उस समय सबसे अधिक जिनको मिलता था , वह शायद  दो लाख रुपये के आस पास का था / लेकिन  सवाल साख का होता है, कान्ग्रेस ने जिस तरह से यह सब किया , उससे यह लोगों के बीच मे सन्देश  गया कि जब एक बात तय की गयी तो कान्ग्रेस ने लोगों का भरोसा क्यों तोड़ा ? ऐसे एक नही , बहुत से उदाहरण भरे पड़े हैं , जब कान्ग्रेस ने अपने हित के लिये , लोगो का भरोसा तोड़ डाला /

कहने का आशय यह कि लोग अब समझने लगे है और लोगों के बीच मे यह समझ पैदा हो गयी है कि कान्ग्रे अब भरोसे के लायक पार्टी नही है / यह पार्टी दूसरे के कन्धों पर बन्दूक साधकर अपना फायदा करती है, इसके उदाहरण जन्ता जब गिनाती है तो बहुत ताज्जुब होता है / जैसे चौधरी चरन सिन्घ के साथ, जैसे चन्द्र शेखर के साथ, जैसे देवेगौदा के साथ, जैसे इन्द्र कुमार गुजराल के साथ, जैसे बसपा के साथ और दूसरे अन्य दलों के साथ / कान्ग्रेस का इतिहास इन सब अनियमितताओं से भरा पड़ा है /

यही कहानी बार बार अगर दोहरायी जायेगी , तो क्या हालत कान्ग्रेस के साथ होन्गे, यह समझने की बात है /

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महात्मा गान्धी ने अपने जीवन काल मे जिन बातों का जिक्रा किया है, वे सब लिपिबध्ध हो गयी है, उनकी क्या सोच थी , वह सब उन्होने बहुत ही nutshell मे लिख दी गयी थी / उनका एक विजन था, जो वह चाहते थे कि सारे राष्ट्र के लोग इसे समझे और इन पर अमल करें / लेकिन महात्मा जी की बात किसी ने  ्भी नही सुनी और आजादी मिलने के बाद से जब सभी नेता सरकार बनाकर मौजे काटरहे थे  तो दूसरी तरफ महात्मा गान्धी एकाकी बन गये और उनको कोई पूछने वाल ही नही बचा /

बाकी जो हुआ , वह सभी को पता है / आज का हाल यह है कि महात्मा जी हाशिये पर है, उनको तभी याद किया जाता है जब कान्ग्रेस को कोई फायदा उठाना होता है /

दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी है , जो शायद गान्धी जी से हमेशा दूरी बनाये रखना चाहती थी, लेकिन शर्मो हया भी कोई चीज होती है / कहां तक भारतीय जनता पार्टी दूरी बनाये रख सकती थी, जबकि पार्टी के ऊपर आरोप लगते रहे कि महात्मा गान्धी के बारे मे पार्टी की क्या सोच है/ आखिर मे भाजपा ने आलोचनाओं से बचने के लिये महात्मा गान्धी को तवज्जो देने के लिये, भले ही वह बहुत थोड़ा यानी न के बराबर हो, रास्ता निकाला और वह यह कि भारतीय जन्ता पार्टी महात्मा गान्धी के ग्राम स्वराज्य में व्यक्त किये गये आर्थिक विचारों को कुछ सीमा तक  स्वीकार करती है /

यह कह कर भाजपा ने सबका मुख तो बन्द कर दिया लेकिन पिछले दरवाजे से महात्मा गान्धी को पार्टी की विचार धारा का एक मामूली हिस्सा ही सही, बना लिया /

पिछले कई सालों से राष्ट्रीय स्वयम सेवक सन्घ का वजूद घट रहा है और धीरे धीरे दिन पर दिन घटता चला जा रहा है / ६० साल पहले का मुझे याद है जब मै छोटा बच्चा था तब हमारे शहर में लगभग सभी पार्कॊ में खाकी पैन्ट पहने सुबह और शाम बहुत बड़ी सन्ख्या मे समाज के लगभग सभी वर्ग के लोग शाखाओं मे जाते थे / शाखायें उन दिनो दिन मे दो बार लगती थी / शाखाओं मे जाने वाले लोग बहुत सभ्य और सुसन्स्कृत व्यक्तित्व वाले लोग समझे जाते थे और सम्झदार और पढे लिखे लोगो की जमात समझी ्जाती थी /

पिछले साठ साल से देख रहा हूं कि अब शाखाओं मे उपस्तिथी न के बराबर है / कही कही तो हाल यह है कि ध्वजावन्दन के लिये कोई स्वयम सेवक रोजाना शाखा लगाने तक ही नही आ पाता या शाखा तक लगाने वाला कोई है ही नही / शहर के लोग अब उतना आर०एस०एस०को कोई तवज्जो तक नही देते है /  अगर यही हाल रहा तो मेरा तो यही मानना है कि अगले पचास साल मे आर०एस०एस०  का वजूद ही समाप्त हो जायेगा और इस पर भारतीय जनता पार्टी के पेशेवर और लालची नेता आधिपत्य जमा लेन्गे / ्कारण यह है कि नये स्वयम सेवक तैयार नही हो रहे है क्योंकि RSS  की शखाओं मे कोई भी व्यक्ति स्वेच्छा से  जाना नही चाहता है / हाल तो यह है कि पुराने और devoted  स्वयम सेवक के परिवार का कोई भी सदस्य आर० एस० एस० की शाखाओं मे नही जाना चाहता है / मेरे घर के पास एक शाखा लगती है जिसमे मै सालों से देख रहा हू कि गिनती के एक या दो लोग ही आते है और ध्वज वन्दन करके चले जाते है/ कभी कभी तो कोई शाखा तक लगाने नही आता है / यह हाल शहरों मे है / इसमें मुझे जो कारण समझ मे आता है वह यह कि सन्घ के स्वयम सेवक अब मौजूदा हालात मे अपने को “बन्धुआ ” समझने लगा है / जैसे दूसरे राजनीतिक दल अपना वोट बैन्क बना रहे है , आर० एस०एस० भी उसी तरह से भारतीय जनता पार्टी के लिये स्वयम सेवक का उप्योग कर रही है /

भारतीय जनता पार्टी  के नेताओं ने समाज मे कोई नई समझ नही पैदा की है / वे वैसा ही कर रही है जैसा कान्ग्रेस करती चली आ रही है / यह अब जन्ता भी समझ चुकी है और इसीलिये  भारतीय जनता से लोगों का मोह भन्ग हो रहा है, क्योन्कि इन्होने ने कुछ नही किया सिवाय हिन्दुओं को मुसलमानों के खिलाफ  घ्रणा फैलाने के /  जनता समझ चुकी है कि   बी०जे०पी० एक तरह से कान्ग्रेस की चाल पर चल रही है / जैसे कान्ग्रेस लूट रही है वैसे ही भाजपा भी लूट रही है / मै ऐसे बहुत से भाजपा के मन्त्रियों को जानता हू जो फटेहाल राज्नीति मे आये थे और आज करोड़ॊ और अरबों मे खेल रहे हैं / इसलिये यह कहा जाये कि आर०एस०एस०  समाज मे कोई क्रान्ति ले आयेगी लोगों को कोई विश्वास ही नही होता है  / यह किसी से छुपा हुआ नही है /

दूसरी बात यह कि आर०एस०एस० का कोई वजूद और उपस्तिथि किसी भी कस्बाई और ग्रामीण इलाके मे नही है / आर०एस०एस० के स्वयम सेवकों को गावों और कस्बाई इलाकों के लोग बहुत इज्जत और आफ्जाई के साथ नही देखते हैं / स्वयम सेवक बहुत हिकारत भरी नजरों से देखे जाते हैं / हाफ पैन्ट पहने हुये देखकर लोग दूरी बनाते हैं / इन इलाकों के लोग आर०एस०एस० क्या चीज है , इसके बारे मे जानते नही है /

एक और बात यहां कहना चाहता हू कि जो भी आज से साठ सत्तर साल पहले के आर०एस०एस० के स्वयम सेवक थे और जिन्दगी बिताकर स्वर्ग पहुन्च गये उनके परिवार के 99.99 % प्रतिशत परिवारी जन आर० एस० एस० से किसी तरह का कोई सम्बन्ध नही रखते हैं / भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने भी वही रास्ता पकड़ा जो कान्ग्रेस का था , भाजपा किसी भी तरह से भी ऐसा नही लगता कि वह दूसरों से अलग हो /

अटल बिहारी बाजपेयी के प्रधान मन्त्री बनने के पीछे का सच और कारण यह है  कि [१] पहला – अधिसन्ख्य  हिन्दुओं को एक झुन्झुना भाजपा द्वारा यह थमाया गया कि अगर भाजपा की सत्ता आयी तो अयोध्या मे राम मन्दिर अवश्य बनाया जायेगा / इस झुन्झुना को लेकर हिन्दुओं ने भाजपा को वोट दिया [२]  अटल जी के प्रति मुसलमान बिरादरी एक soft corner  रखती है, यह उनके व्यक्तित्व की वजह से था / मुसलमान भी चाहता था कि अटल जी इतने दिनों तक देश की सेवा करते रहे , इनको भी एक बार मौका देना चाहिये / मुसलमान अपना विरोध भी इसके साथ व्यक्त करना चाहते थे / इसके लिये मुसलमानों कि जमात ने फैसला लिया कि वे इस चुनाव में वोट नही डालेन्गे , न ही किशी भी पार्टी को वोट देन्गे और तटस्थ रहेन्गे / मुसलमान जान्ता था कि इस तरह से उनका विरोध भी हो जायेगा और वोट न देने से भाजपा की सीटे ही  बढेन्गी  / [३] देश की  दूसरी Minorities यथा पारसी और क्रिश्चियन और बौध्ध लोगों से मेरी बात हुयी,  सभी का मानना था कि एक बार अटल जी को देश की इतने साल सेवा करने के एवज में प्रधान मन्त्री बना देना चाहिये / एक पारसी ने मुझसे कहा कि ” हमने अपने समुदाय का वोट अटल जी की सूरत को देखकर दिया है” /

आर०एस०एस० के पास देश के नागरिकों की कितनी सेवा की है ये तो वही बता सकते है  लेकिन यह सत्य है कि उनके द्वारा समर्थित उनकी राजनीतिक विन्ग ने कोई अनूठा कार्य  किया हो जो सर्व व्यापी हो / हाल फिल्हाल गुजरात को छोड़ दें तो बाकी राज्यों मे उनके द्वारा पोषित सरकार के मन्त्री उसी राह पर है जो केन्द्र में सरदार मनमोहन सिन्घ के मन्त्री कर रहे है /

RSS001tushargandhipunjivadIभारत मे पून्जीवादी अर्थ व्यवस्था है  / पून्जीवादी अर्थ व्यवस्था बिना भ्रष्टाचार किये पनप नही सकती  है , इसलिये यह मानना बहुत जरूरी है कि अगर पून्जी वाद है तो भ्रष्टाचार अवश्य है / इसका मतलब यह हुआ कि पून्जीवाद और भ्रष्टाचर का चोली दामन का साथ है / यह एक माना हुआ सिध्धान्त न भी हो तो भी इसके समझने के बहुत से कारण भी है /

हमे यह मान लेना चाहिये और इसे स्वीकार भी कर लेना चाहिये कि ्जब हमने पून्जीवाद को अपनाया है तो भ्रष्टाचार तो अवश्य होगा ही / अब यह भ्रष्टाचार किस लेवेल का हो सकता है, यह भी समझना जरूरी है /

अन्ग्रेजी मे एक कहावत है कि Honesty is the best policy यानी कि ईमान्दारी एक सर्वोत्तम नीति है / गहरायी से विचार करें तो यह उक्ति किसी कूटनीति से कम नही आन्की जा सकती है /  मेरा मानना है कि आप भ्रष्टाचार करते हुये भी ईमान्दार बने रह सकते हैं / अपने को दूध के धुले हुये साबित कर सकते है / अन्ग्रेजों ने शायद यह उक्ति पून्जीवाद के खतरे के मद्दे नज़र रखते हुये पैदा की होगी / यह उक्ति एक ऐसी दूर की कौड़ी  है जो भ्रष्टाचारी को ईमान्दार और बहुत ईमान दार साबित कर सकती है / अन्ग्रेजों ने ईमान्दारी को एक rule  नही बनाया , न ही condition ,  न ही terms, न कोई धारा की शक्ल दी है / पूर्व प्रधान मन्त्री राजीव गान्धी ने स्वीकार किया है कि शीर्ष स्तर से जब 100  रुपये किसी निर्माण कार्य के लिये दिये जाते हैं  तो केवल 15 रुपये खर्चा होता है बाकी का 85  पैसा भ्रष्टाचार और लूट खसोट मे चला जाता है /

अन्ना हजारे ने एक बात बहुत अच्छी कही है कि देश से भ्रष्टाचार उनके लोक पाल बिल से ६० प्रतिशत तक कम किया जा सकता है  लेकिन देश से भ्रष्टाचार पूरी तरह से समाप्त नही किया जा सकता है / ऐ्सा मान भी लेना चाहिये / अब यह होगा कि जो १०० रुपया होगा वह ४० के आस्पास खर्चा होगा और जहां १०० रुपये मे से १५ रुपये खर्चा होते थे वहां अब १५ की बजाय ४० खर्चा होन्गे / लेकिन ६० प्रतिशत भ्रष्टाचार और लूट का मार्जिन १०० रुपये मे तो बना रहेगा / यही पर HONESTY IS THE BEST POLICY  जुमला फिट बैठता है / यानी अगरचे १५ के बजाय  ४० खर्चा किये गये तो बन्दा की यह ईमानदारी ही कही जायेगी कि उसने १५ के बजाय बहुत ईमान्दारी के साथ ४० रुपये खर्चा कर दिये / अगर बन्दा चाहता तो वह सारा का सारा १०० रुपया पी जाता और डकार भी न लेता / यह तो बन्दे की इमान्दारी है कि उसने १५ की बजाय ४० खर्चा कर दिये है / यही तो ईमानदारी की पालिसी है /

यह सही है कि आम आदमी पार्टी अन्ना के अन्दोलन से निकली हुयी एक पार्टी है जो हालाते हाजरा का एक नमूना ही कही जायेगी / यह बदलाव का दौर है / लोगो के अन्दर निराशा है / देश की दो बड़ी पार्टियों ने इस देश के आम आदमी का हक मारा तो है ही उसे चूस चूस कर मरने के लिये पुर्साहाल करके छोड़ दिया है / उनकी तकलीफो को कोई सुनने वाला नही है ? वे कहां जायें ? क्या करें ? उनको कहां राहत मिले ? देश का कोई अफसर, सरकार का कोई नुमायन्दा, राज्कनीतिक दल का कोई सारोकारी, किसी की भी  कोई जिम्मेदार नही ? कोई जवाब देह नही ? लूटने और रिश्वत लेने के मामले मे सब एक हो जाते है  लेकिन समस्याओं के हल के लिये आम आदमी परेशान हाल होकर बद से बदतर हालात मे होता जा रहा है / अजीब बात यह है कि यह किस तरह का लोक तन्त्र है / बात बात मे सम्विधान की दुहाई दी जाती है , नेता कहते है कि सम्विधान यह नही करने की इजाजत देता, सम्विधान मे ऐसा नही है / सवाल यह है कि सम्विधान लोगो को सुविधा मुहैया कराने के लिये बनाया गया है या लोगो की मुसीबते बढाने के लिये है / सम्विधान मे अगर कोई खामी है तो उसे हटाइये / जिस देश के सम्विधान में ६४ साल के अन्तराल में १०० से अधिक बार सन्शोधन किये गये हैं , यह सन्शोधन क्यों किये गये अगर यह ठीक था , सवाल यहा इस बात का है ?

दूसरी तरफ देश के नेता अपने air conditioned  कमरों मे बैठ कर देश की जनता को ककहरा का पाठ पढा रहे है इसलिये कि उनका वोट बैन्क कही छिटक ना जाये / कहां से वोट का और बहुमत का जुगाड़ किया जाये इसके बारे मे गणित लगाई जा रही है / कान्ग्रेस और भाजपा दोनो ही अपनी अपनी जुगत और सेन्ध मारी मे लगी हुयी है / इन पार्टियों की जन्ता से दूरी बनती चली जा रही है , यह एक सत्य है और इसे राजनीतिक दलों को स्वीकार करना होगा /

ऐसे मे आम आदमी पार्टी का उदय होना किसी चमत्कार से कम नही है / यह भी एक सत्य है जो मैने लोगो के बीच मे जाकर गांव गांव और कस्बो कस्बों और शहर शहर मे आम आदमी पार्टी के बारे मे जानने की कोशिश की / जिस तरह की राजनीति की शुरुआत और देश की जनता मे राजनीतिक बदलाव लाने की  तस्वीर आम आदमी पार्टी की है , उससे लोग बहुत उतसाहित है / लोगों को यह लग रहा है कि वे दिन बीत गये जब नेता जी वोट लेकर पान्च साल के लिये गायब हो जाते थे और फिर उनकी शकल देखने को लोग तरस जाते थे / लोगो को अब पता चलने लगा है कि नेता देश को कैसे चला रहे है और किस तरह से भ्रष्टाचार कर रहे है /

जिस तरह की वाहियात हरकत देश के राज्नीतिक दल कर रहे है , उससे उनका ही अन्दरूनी exposure  हो रहा है और इन सभी राजनीतिक दलों की अन्दरूनी औकात का पता देश की जनता को चल रहा है  / निश्चय ही जितना आम आदमी पार्टी के ऊपर वैचारिक हमले और जितनी ही मीडिया आम आदमी पार्टी की मजम्मत करेगा , जितना ही कान्ग्रेस और भाजपा इस “आप” पार्टी पर हमला करेन्गे , उतना ही आप पार्टी और मज्बूत होकर उभर रही है / ऐसा सब जगह  देखने मे आया है / लोग इस लड़ाई को बहुत कौतूहल के साथ समझ रहे है कि आखिर ऐसी क्या बात है कि “आप” के ऊपर मीडिया भी हाबी है , कान्ग्रेस भी हाबी है  और भाजपा भी हाबी है , यह क्यो और किस लिये , जब्कि उनकी सरकार बने अभी तीन हफ्ते ही हुये है और मीडिया भी चाहता है कि आनन फानन मे सब कुछ हो जाये, उनका जितना मैनीफेस्टॊ का एज्न्डा है सब १०० प्रतिशत फौरी तौर पर लागू हो जाये , कान्ग्रेस भी कहती है कि एक घन्टे मे ही सारा एजेन्डा लागूकर दिया जाये , भाजपा भी कहती है कि एक दिन मे सब मैनी फेस्टॊ लागू कर दिया जाये / यानी कुल मिलाकर सब चाहते है कि “हथेली मे फौरन सरसों को जमा दिया जाये” /  कुछ लोगॊ ने कहा कि जब देश मे लोकपाल विधेयक ४५ साल बाद पास किया गया उसके बारे मे किसी ने भी सवाल नही पूछा / क्या पिछले ६० साल मे कान्ग्रेस ने अपने इलेक्शन मैनीफेस्टो मे जो बाते कहीं है , वो सबकी सब पूरी हुयी /

अधिकान्श लोगो का मानना है कि केजरीवाल ने सही मायने में महात्मा गान्धी की याद जिन्दा कर दी है और उनकी कार्य शैली की फिर से याद दिला दी है / कान्ग्रेस और भाजपा और अन्य किसीभी दल ने महात्मा गान्धी के विचारों को कोई तबज्जो नही दी है लेकिन जाने मे या अनजाने मे ही सही  केजरीवाल जैसा कर रहे है , वह महात्मा गान्धी की कार्यशैली जैसा ही है , ऐसा ही आभास होता है /

जनता बहुत गुस्से मे है और  नेताओं के बयान अब उसको अच्छे नही लग रहे हैं  और  कानों को सुहाते तक नही है / नेताओं के बयान अब जनता के कानों में चुभने लगे हैं / झल्लायी हुयी जनता एक एक दिन पार करके , एक एक दिन जैसे तैसे बिता करके , उस चुनाव का इन्तजार कर रही है जहां वह अब देश के बड़े राजनीतिक दलों को धूल चटाने का मन बना चुकी है /

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