“हां, मुझे गर्व है अगर शिव सैनिकों ने बाबरी मस्जिद ढहा दी है ” – बाला साहब ठाकरे, मुम्बई ::::: ” हां, हम साम्प्रदायिक हैं ” – सुषमा स्वराज, लोक सभा के अन्दर ::::: ” हां, मै अराजक हूं ” – अरविन्द केजरीवाल , मुख्य मन्त्री, रेल भवन सड़क दिल्ली पर

देश का इलेक्ट्रानिक मीडिया और इसके चैनल किस तरह की  खतरनाक पत्रकारिता कर रहे है और गैर जिम्मेदार पत्रकारिता का उदाहरण प्रस्तुत कर रहे है, यह मै पिछले कई हफ्तों से देख रहा हू /

मुझे यह कहने मे अब कोई हिचक नही लग रही  है कि इलेक्ट्रानिक पत्रकारिता बेकाबू होने की कगार पर हो जाये,  इस पर केन्द्र सरकार को गाइड लाइन जारी  करके अभिव्यक्ति की आजादी पर कुछ लगाम लगाने की जरूरत है / वरना यही इलेक्ट्रानिक मीडिया किसी दिन  कोई बड़ा बवाल सारे देश मे कानून व्यवस्था का न खड़ा कर दे, जो सम्भाले न समभले , इसकी मुझे आशन्का है / इसलिये जरूरी है कि सम्विधान मे अभिव्यक्ति की आजादी की आड़ लेकर इस खुली छूट और खुली उच्छ्रन्खल्ता पर लगाम लगाई जाय / भारत मे जिस तरह की मीडीया को छूट मिली हुयी है , उसके तुलनात्मक अगर देखा जाये तो यूरोपीय देशो मे मीडिया पर कुछ बन्दिशे हैं / अमेरिका जैसे देशों मे भी कुछ बन्दिशे हैं /

यह साठ [वर्ष१९६०] के दशक की बात है अपने पत्रकारिता और फोटो-पत्रकारिता के समय मे हमसे जितने भी सीनियर पत्रकार होते थे, वे बहुत ईमान्दारी के साथ उतना ही लिखते थे जितना वह स्वयम देखते और समझते थे / “आफ दि रिकार्ड” और “आन दि रिकार्ड” की बहुत सन्जीदगी और विश्वास के साथ पालन किया जाता था / उतना ही अखबार मे प्रकाशन के लिये जाता था जितना सही और उचित लगता था और “जर्नलिस्टिक टच” देने की कोई जरूरत नही समझी जाती थी और न इस तरह की practice  की जाती थी / अपने से सीनियर पत्रकारों को ऐसी कार्य शैली देखकर यही आदत और गुण हम नवोदित अखबार नवीसों मे भी आ गयी /  मैने बहुत ईमानदारी के साथ पत्रकारिता की / मैने नई दिल्ली के इन्स्टीट्यूट आफ जर्नलिस्म से Diploma in Journalism की डिग्री हासिल की है / १९६० के दशक में  हिन्दुस्तान समाचार समूह द्वारा प्रकाशित “साप्ताहिक हिन्दुस्तान” पत्रिका के सम्पादक श्री भटनागर जी मेरे प्रधानाचार्य और अध्यापक थे जिनके सानिध्य मे मैने पत्रकारिता का कोर्स बाकायदा क्वालीफाई किया / उस समय यह बहुत चकित करने वाली बात थी कि  पत्रकारिता भी कही पढी जा सकती है /

मै स्थानीय और राष्ट्रीय स्तर के कई दैनिक और साप्ताहिक अखबारों मे कार्य कर चुका हूं  /  मै समाचार की कवरेज और घटनाओं की फोटोग्राफी दोनो काम एक साथ कर  लेता था / मेरे बारे मे सभी पत्रकार जानते थे कि मै दारू या शराब नही पीता हू और न मै मीट-मुर्गा खाता हू और न ही मै किसी तरह का गिफ्ट स्वीकार करता हू /   मै  स्वयम कभी भी किसी से न तो गिफ्ट लेता था और न ही  मै दारू की बोतल तथा मीट-मुर्गा और दावत उड़ाने वालों पत्रकारों मे शामिल था / अलबत्ता होता यह था कि दूसरे पत्रकार मेरे share  की बोतल तथा दूसरे अन्य साधन मेरे नाम से हड़्प लेते थे और उसका उपयोग करते थे /

पत्रकारिता मेरे लिये मिशन थी और मै इसको समाज सेवा का एक माधयम मात्र समझता था / आर्थिक रूप से यह मेरे लिये कष्ट साध्य व्यवसाय  था और मै अपने परिवार की जरूरतों को तब तक पूरा करता रहा जब तक पत्रकारिता मेरे लिये   जीविका का साधन बना रह सकता था / पत्रकारिता जैसे इस पवित्र पेशे के प्रति मै किसी तरह की बेईमानी करना नही चाहता था, मेरा जमीर इसके लिये मुझे इजाजत नही देता था / जब मैने देखा और महसूस किया  कि आर्थिक रूप से मै पत्रकारिता करके अपने परिवार को भी नही चला सकता हू और मेरा परिवार ही आर्थिक सन्कट मे आ जाये तो मैने उसी दिन से पत्रकारिता की सक्रियता से अपने को दूर कर लिया और दूसरा काम अपनी जीविका को चलाने के लिये करने लगा /

लेकिन पत्रकारिता और लेखन कार्य लगातार जारी रहा , मैने अपने पत्रकार मित्रों के अखबारों मे कालम लिखने शुरू किये जो आज तक जारी है / मुझे जब भी अपने कार्य से फुरसत मिलती है तो मै ज्रूर अपने विचार सब्को बताने का प्रयास करता हूं /

मैने पिछले  ५० और ५५ साल के बीतते समय का आनकलन किया है और चर्चा भी करता हू / स्वतन्त्रता के बाद के १० साल का  समय बीतते बीतते अखबार नवीसों मे दुर्गुण आने लगे / पीत पत्रकारिता YELLOW JOURNALISM  हाबी होने लगा / कुछ पुलिस की दलाली करने लगे / कुछ नेताओं के चमचे बन गये / कुछ राज्नीतिको के पिछलग्गू बन गये / ऐसे भी अखबार नवीस पैदा हो गये जो एक कप चाय और एक सिगरेट पीकर खबरे छापने लगे / कुछ दारू की बोतल और मीट मुर्गा के चक्कर मे ही नेता और अफसर और उच्च्वर्गों का साथ देने लगे /

यह प्रिन्ट मीडीया का समय था / अमूमन दैनिक अखबार ४ पेज या छह पेज के निकलते थे चाहे वह हिन्दी के हो या अन्ग्रेजी के अथवा उर्दू के / अच्छे और ईमान्दार पत्रकारों  की जमात धीरे धीरे खत्म होने लगी और मुम्बई से प्रकाशित “ब्लिट्ज” की तर्ज पर पीत पत्रकारिता  यानी yellow journalism   का उदय होना शुरु हो गया / YELLOW JOURNALISM   आने से पत्रकारों को back door   से पैसा मिलने लगा और फिर क्या था , पत्रकार बिकने के लाइन लगाये खड़े हुये थे /

क्या आप विश्वास करेन्गे कि मैने ६० साठ रुपये महीने की नौकरी करके पत्रकारिता की है ? मेरे समकालीन तो ऐसे थे जिनको यह भी नही मिलता था / एक दिन मै बैन्क मे किसी काम से पैदल जा रहा था, यही सब मेरे मन मे उथल पुथल मच रही थी और पत्रकारिता के भविष्य पर सोच रहा था और यह भी कि “पीत पत्रकारिता” क्यो लोग करने के लिये उत्सुक होते है ? उसी समय एक जुमला मन मे उभरा कि ” भूख के आगे सभी आदर्श और दर्शन झुक जाते हैं “ / यह जुमला अचानक मन मे पैदा हुआ , यह मुझे अच्छा लगा, उसी समय सड़्क पर खड़े होकर अपनी डायरी मे इसे लिख लिया /

पत्रकारिता मे आ रही गिरावट का सबसे बड़ा कारण इसका व्यवसायी करण होना है / जो चीज mission  के रुप मे होनी चाहिये थी , उसे जब व्यवसाय बनाया जायेगा तो वह बिकने के लिये तैयार है, जो चाहे जितना चाहे खरीद ले / आज कल यही हो रहा है / राजनीति किसी समय एक mission जैसा था जो जनता की सेवा  करने के लिये प्रमुख लक्ष्य जैसा लेकर की जाती थी / आज राज्नीति का व्यवसायी करण हो गया है / ६० साल के ज्यादा के अन्तराल मे मैने यही देखा है कि राज नेता का एक ही मकसद है कि कितना पैसा लूट सकते हो . कितना पैसा बना सकते हो , कितना पैसा हजम कर सकते हो, यही उनका मुख्य उद्देश्य है ?

कोई यह समझे कि ये सब नेता उनकी और देश की सेवा कर रहे है तो यह इस देश की जन्ता को भूल जाना चाहिये / आये दिन नेताओं की लड़ाई जग जाहिर है / कोई सही बात कह रहा है तो उसको “पागल” कह दीजिये / कोई राज्नीति का “मस्खरा” है / किसी को “मान्सिक रोगी” कह दीजिये / कोई “वाहियात” है / कोई दिमागी “दिवालिया” है / और भी हजारों बाते / देश का इलेक्ट्रानिक मीडिया के पास दिन्भर और कई कई दिन तक यही सब दिखाने के लिये अलावा कुछ और है ही नही , ऐसा लगता है ?

इलेक्ट्रानिक मीडिया को और कुछ दिखाई भी नही देता / उनके लिये इस समय “आप”  और उनके “बाप” कौन कौन से है , यही बताने से फुर्सत नही है / दिल्ली माना कि देश की राजनीति का epicenter है लेकिन देश यही अकेले नही है / वहां क्या हो रहा है , इसको बताने की कोई जरूरत इलेक्ट्रानिक मीडिया शाय्द नही समझता है /

भारत सरकार की इलेक्ट्रानिक चैनलों की नीति हमेशा के लिये तीन बातों पर आधारित है / पहला ; शिक्षा देने का प्रावधान , दूसरा ; मनोरन्जन  प्रदान करने का प्रावधान और तीसरा सूचना देने का प्रावधान / मेरे विचार से केन्द्र सरकार के सूचना मन्त्रालय को सभी इलेक्ट्रानिक चैनलो को इन्ही तीन बातों पर आधारित और निम्न सुझावित गाइड लाइन जारी करना चाहिये ताकि वे तटस्थ पत्रकारिता करे या उस पर विचार करते हुये अप्ना प्रसारण व्यवसाय स्थापित करें ;

१- सभी इलेक्ट्रानिक चैनलों को वही दशा निर्देश पालन करने के लिये कहा जाय जो “प्रसार भारती” के लिये आवश्यक बताये गये है, इसमे कुछ फेर बदल कर सकते है  /

२- देश के अन्दर क्या विकास किये गये है और किन किन राज्यों में क्या विशेषताये है और उन राज्यों मे क्या हो रहा है इसके लिये कार्यक्रम बनाये और कई बार रिपीट करे

३- केन्द्र सरकार अथवा राज्य सरकार की योजनायो का किस तरह से फायदा या नुकसान हुआ इसका अन्कलन करके बताना होगा

४- बुल्बुलें लड़ाने वाले कार्यक्रम में कहने वालोंऔर बताने वालों को समय पूरा पूरा देना चाहिये / इस बारे मे आज तक के एन्क्रर श्री पुन्य प्रसून बाजपेयी की कार्य शैली को as a role model या प्रसार भारती के Shri Nikam  की शैली को अपनाना होगा /

५- खेत खलिहान और कृषि से समबन्धित कार्य क्रम दिखाना सभी चैनलो को अनिवार्य किया जाना चाहिये

६- देश की बहुत सी समस्याये है जिन पर कभी चर्चा तक नही होती, चाहे वह आर्थिक सुधार की बाते हो या आर्थिक नीति , विदेश नीति, विश्व मे हम कहा पर है , हमारा स्थान क्या है आदि आदि

देश की जनता को यह बताना चाहिये कि हमने कहां कहां और क्या क्या विकास किया है ?  न कि यह कि युगान्डा की लड़्कियां क्या कर रही  है या सोमनाथ भारती इस्तीफा क्यो नही दे रहे है या दिल्ली मे ड्रग रैकेट है या नही , या दिल्ली के किसी कान्स्टेबिल को हटाने या तबादले के लिये सन्सद से मन्जूरी लेनी होगी अथवा नही या सुषमा स्वराज ने सन्सद मे कहा कि “हां, हम साम्प्रदायिक हैं ” या यह कि अर्विन्द केजरीवाल ने कहा कि “हां, मै अराजक हूं” या बाला साहेब ठाकरे ने कहाथा कि “हां हमे गर्व है………………” , ऐसी फिजूल बातों की चर्चा करके यह इलेक्ट्रानिक चैनल देश कि एक अरब ३० करोड की जन्ता को क्या सन्देश देना चाहते है ?

इस तरह से की जा रही इलेक्ट्रानिक चैनलों की प्रैक्टिस को बन्द किया जाना चाहिये और सख्ती से बन्द कराना चाहिये /

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