“आफ दि रिकार्ड ” की गयी बातचीत का कोई मतलब नही है ? यह पत्रकारिता का जमाने से चला आ रहा एक तरह की परम्परा और दस्तूर है / यह केवल “जर्नलिस्टिक टच” देने के लिये किया गया है / “OFF THE RECORD” HAVE NO VALUE TO NOTE AND CONSIDER IN JOURNALISM, WHATEVER IS SAID IS A TRADITIONAL WORK OF JOURNALISM AND SHOULD NOT BE TAKEN IN ANYWAY SERIOUSLY.

उपर दिये गये वीडियो मे जो कुछ भी आप देख रहे है , ऐसा हमेशा होता है / इसे “आफ दि रिकार्ड” की गयी बात चीत कही जाती है  / इसमे कुछ भी गलत नही है / यह पतरकारिता  के क्षेत्र में हमेशा से और जमाने से चला आ रहा दस्तूर है  और परमपरा है / यह ऐसी परम्परा है जिसे तोड़ा भी नही जा सकता है /

राजनीति और कूट नीति का तथा राज काज और शासन चलाने के लिये इसी तरह से सारी दुनिया में off the record  बातचीत यानी वह बात्चीत जो पत्रकारों और नेताओं के बीच होती है , वह सबके सामने न आये और परदे के पीछे ही रहे, ऐसी एक परम्परा बन गयी है /

ऊपर जिस वीडियो के देखा जा रहा है वह कोई नई बात नही है और इसमे कोई आश्चर्य की बात भी नही है / जो इस तरह के वीडियो को देखकर हो-हल्ला मचाये हुये है , वे नही जानते कि पत्रकारों को पर्दे के पीछे क्या क्या झेलना पड़्ता है /

इन्दिरा गान्धी के जमाने मे पत्रकार उनके आगे पीछे आकर कुत्ते की दुम की तरह पून्छ हिलाया करते थे /  वह जो चाहती थी वही लिखा जाता था / यह तो कुछ भी नही है / इमर्जेन्सी के दरमियान जिस खौफ मे हम पत्रकार अपनी जान बचा कर और खुद अपनी आवाज का गला घॊटकर जिस तरह से जेल जाने के डर से पत्रकारिता करते थे , वह कितना  हौल पैदा करने वाला था जिसे बयान करना मश्किल है /

देश के बड़े नेताओं के इन्टर्व्यू लेने से पहले हम उनसे औपचारिक बात्चीत करते थे / हम उनसे यह कहते थे कि यह सब “आफ दि रिकार्ड ” बातचीत है यानी वह बात्चीत जो सार्वजनिक नही होती थी और न अखबार मे छापी जाती थी  / जब इन्टर्व्यू शुरू करते थे तो जिसका इन्टर्व्यू होता था उससे हम कहते थे कि अब जो भी बात्चीत होगी , वह “आन दि रिकार्ड” यानी ON THE RECORD  होगी और यही छपने के लिये अखबार मे जायेगा / इन्टर्व्यू समाप्त होते ही नेता जी को बता दिया जाता था कि अब इनटर्व्यू समाप्त हो गया है और जो भी बात्चीत होती है वह अब OFF THE RECORD  होगी /

दरअसल यह एक तरह से राज नेताओं और पत्रकारों के बीच की  अनौपचारिक बात चीत करने  का ऐसा सिल्सिला है  जो शासन चलाने और जन्ता क्या सोचती है ऐसा फीड बैक लेने का माध्यम पत्रकारो और राज्नेताओं के बीच का है / यह न हो तो नेताओ को भी नही पता होता कि कहां क्या हो रहा है ? नेता भी अपनी तरफ से हमसे कहते थे कि ऐसा सवाल न पूछियेगा या यह सवाल ्जरूर पूछीयेगा / कभी कभी नेता जी यह मान्ग लेते थे कि आप क्या क्या पूछेनेगे तो मै उसी तरह से जवाब देने के लिये  स्वयम को तैयार कर लूं / इसके लिये हम वही बैठकर नेता जी की चाय पीते पीते सवालों की सूची बना देते /

मै समाचार सन्ग्रह करने के साथ साथ PHOTOGRAPHY   करता था इसलिये जब PHOTO लेना होता था तो मै नेता जी की मेज और बैक ग्राउन्ड को देखकर  और उनके अनुकूल बैक ग्राउन्ड impressive बनाने के लिये  फेर बदल् करता था  ताकि नेता जी का पोज ठीक ठीक आये /

दन्गा फसाद की स्तिथि मे कभी कभी हमे अफसरों को फीड बैक देना होता था जब हम जरूरी समझते थे / ऐसा हम दन्गा ग्रस्त क्षेत्र  मे कर्फ्यू लगे होने की स्तिथि में दन्गाइयो से मिलते थे और उनकी बात सुनकर और स्तिथि का जायजा लेकर प्रशासन को बताते थे कि वहां कैसी स्तिथि है और क्या करना चाहिये ? यह हम पत्रकार अपने पत्रकारिता का धर्म निभाते हुये करते थे / जहां भारी पुलिस बल हो जहां मिलिटिरी लगी हो जहां पुलिस लाठी दन्डा चला रही हो वहाऐसे माहौल मे जाकर पत्रकारिता का धर्म निभाना जान जोखिम का काम होता है / मै कई बार लाठी चार्ज मे पी०ए०सी० के डन्दे खा चुका हू और एक बार तो पी०ए०सी० ने मेरा कैमरा तोड़ डाला था और धुनाई भी की /

बहुत कुछ कहना चाहता था / लेकिन जिस तरह के कमेन्ट्स उक्त वीडियो मे कहे गये है , ये दुखदायी है , कम से कम पत्रकारों के लिये तो है / इस तरह की मान्सिकता का विकास पत्रकारिता के लिये बहुत खतनाक है / अगर यही सिल्सिला इसी तरह चलता रहा तो राज नेता इन्टर्व्यू देने से ही कतराने लगेन्गे और  देश की जन्ता को जो कुछ समझने और जानने का मौका मिल रहा है , वह भी नही मिलेगा /

इस तरह का चलन पारमपरिक रूप से लगभग सभी  देशो मे है / जिस किसी ने इस तरह की clippings को दिखाया है उसने कोई बहुत प्रशन्सनीय कार्य नही किया है  /

ऐसा लगता है कि यह एक “दुर्भावना से और बदला लेने की  भावना से ग्रसित कार्य” है / जिसने किया है उसको शायद यह नही पता कि “हमाम मे सब नगे होते हैं” / याद करिये जी टीवी के सुधीर चौधरी को जिन्होने नवीन जिन्दल से कई करोड़ रुपये मान्गे थे और कुछ दिन जेल मे भी बन्द रहे अब जमानत मे चल रहे है /

जो लोग यह समझते है कि ऐसी क्ळीपिन्ग्स दिखाकर पत्रकार एन्कर पुन्य प्रसून बाजपेयी को बदनाम करेन्गे या अरविन्द केजरीवाल की साख पर कुछ बट्टा लगेगा , उन्को यह सब भूल जाना चाहिये / इस clippings  को देखने के बाद इन्की साख और अधिक ज्यादा हो गयी है , क्योन्कि इस चुनावी माहौल मे जन्ता यही समझ रही है कि यह विरोधियों की  चाल है और इस पर ध्यान देने की कतई जरूरत नही है /

 

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