न्याय यात्रा – २ ; तरह तरह के न्यायाधीश ; न्यायाधीशो की तरह तरह की कार्य शैली

मुझे कई शहरो की अदालतो मे मुकदमे लड़्ने का अवसर मिला है / मैने देखा है कि न्यायाधीशो की कार्य प्रणाली भी बड़ी बिचित्र तरह की होती है /

मै ऐसे न्यायाधीशो को मूल रूप से तीन कैटेगरीज मे रखून्गा /

पहले ऐसे न्यायाधीश है जो बहुत सुस्त और काहिल किस्म के होते है

दूसरे ऐसे न्यायाधीश होते है जो न तो सुस्त होते है और न चुस्त होते है

तीसरे ऐसे न्यायाधीश होते है जो थोड़ा सा सक्रिय होते है

चौथे ऐसे न्यायाधीश होते है जो अधिक सक्रिय होते है और मामले तेजी से निपटाने मे रुची रख्ते है /

पान्चवे ऐसे न्याधीश होते है जो बिना आर्थिक लिये काम नही करते है / आप मेरा इशारा समझ गये होन्गे /

कई दशक पहले उन्नाव जिले उत्तर प्रदेश की कचहरी मे एक सिविल जज साहब आये थे / उनका नाम श्री सईदुल हसन सिद्दीकी था / [ जैसा कि उनका नाम मुझे याद है पर यह हो सकता है कि उनका नाम मैने सही न लिखा हो , जब कचहरी जाउन्गा तब पुराने वकीलो से पूछ कर सही कर लून्गा] / सईदुल साहब की अदालत की कार्य प्रणाली देखकर मुझे बहुत ताज्जुब हुआ क्योन्कि ऐसा उन्नाव कचहरी मे कभी सिद्दिकी साहब जैसा सक्रिय कोई जज नही आया था / मेरे कई मुकदमे उनकी अदालत मे चल रहे थे / मुझे जज साहब की कुछ खास बाते बहुत अच्छी लगी उनको मै आप सबके साथ शेयर करना चाहून्गा /

१- जब कोई वकील अप्लीकेशन लेकर इस बात के लिये आता था कि उसके घर मे काम है और वह आज अदालत मे नही आ सकता है तो जज साहब उसके ऊपर कास्ट लगाकर तो या तीन दिन बाद की डेट दे देते थे / कास्ट भी कम नही होती थी , जज साहब दो सौ रुपये या तीन सौ रुपये या अधिक की कास्ट लगाते थे / यह लगभग ३० साल पहले की बात है / इस कारण से मुवक्किल चाहते थे कि सुनवाई जल्दी हो सके और यह होता था/

२- जज साहब ज्यादा दिन की डेट नही देते थे / १५ दिन से लेकर तीन हफ्ते का समय देते थे / मेरे कई मुकदमे उन्होने दो साल मे फैसल कर दिये थे / ऐसा  फास्ट काम करने वाले यह जज साहब के अलावा मुझे दूसरा अभी तक उन्नाव की कचहरी मे कोई दूसरा देखने मे नही आया /

३- उन्नाव जिले की एक अदालत मे मेरा एक मुकदमा १६ साल तक लटका पड़ा रहा जिसमे प्रतिवादी ने ज्वाब दावा ही नही लगाया और एक बहाना से लेकर दूसरे बहाना बनाकर १६ साल तक लटकाये चला जा रहा था / मामले की नाजुकता देखते हुये कि अगर यही हाल रहा तो मै अब ७१ साल का हो गया हू अभी मुकदमा दो कदम भी नही चला और अब अगर मै लड़्ता हू तो शायद मै जिदा रहू या न रहू , कानपुर शहर से उनाव कचहरी तक अगर इसी हाल मे दौड़ता रहा तो मेरा कचूमर निकल जायेगा / यह सोचकर मैने प्रतिवादी से ५० हजार रुपये देकर और उसकी चिरौरी विनती करके हाथ पैर जोड़ करके और मफी मान्गकर किसी तरह से अपनी जगह पुन: हासिल की / यह व्यक्ति मेरी जगह पर ३० साल तक पूरे मकान पर कब्जा किये हुये थी और यह जगह उस समय के हिसाब से ५०००/- पान्च हजार रुपये प्रतिमाह के किराये की थी / लेकिन यह शख्स मौज उड़ाता रहा और ताला लगाकर भाग गया / बडी मुश्किल से मैने उसको मनाया और अपनी जगह वाप्स ली जो बहुत जर्जर हालत मे कर दी गयी थी /

जज साहबान से मैने सब कुछ कहा लेकिन कुछ भी नही हुआ / हुआ यह कि जो प्रतिवादी के वकील थे उनका एक भाई आई०ए०एस० अधिकारी थे /

४- एक बार  मेरा मुकदमा प्रतिवादी के वकील ने “पारिवारिक अदालत” मे स्थानान्तरित करा दिया / इस अदालत का हाल ही बहुत बुरा था / सारा दिन अदालत की कार्य वाही मे पारिवारिक विवाद होते रहते थे जो सुबह अदालत के शुरू होने के साथ साथ शाम चार पान्च बजे तक चलते रहते थे और बाद मे तारीख मिल जाती थी / दो महीने  बाद की तारीखे  दि जाती थी जिनमे एक माह की जून महीने की छूट्टी यानी साल मे पान्च तारीखे मुकदमे की सुनवायी हो पाती थी /

इसी अदालत मे एक ऐसे जज साहब आये जो टेन्शन मे आते ही अपनी मूछे मरोडने लगते थे और वादी और प्रतिवादी से कहते थे कि ” यह अदालत है और आप मुकदमे मे आये है ………………….” जब तक वह बोलते रहते अपनी मूछे टेते रहते थे यानी ताव देते या मरोडते रहते थे / पारिवारिक अदालत होने के कारण यहा वकील बहस नही करते थे और क्लाइन्ट / वादी /प्रतिवादी  को खुद ही जज के सामने कहना होता था जो वह कहना चाहते थे /

इस अदालत मे कई साल बिना किसी तरह की कार्यवाही के मेरे मुकदमे मे कुछ भी नही हुआ अन्त मे पान्च साल बीतने के बाद मैने अपना मुकदमा दूसरी अदालत मे ट्रान्सअर कराया तब जाकर मुकदमे कुछ आगे बढा /

 

 

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