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देश के टूटने का खतरा ?? क्या हम शक्तिशाली सोवियत रूस की तरह टूट कर कहीं अलग अलग होने की तरफ तो नहीं जा रहे हैं ???????????

मुझे अभी अभी पता चला कि टीम अन्ना के साथ अन्ना हजारे जी भी आमरण अनशन पर बैठ गये हैं /

यह इस देश के लिये बहुत दुखदायी और निराशा जनक स्तिथि है / परिस्तिथियां यहां तक फिर आ पहुची जैसे एक साल के तकरीबन पहले थी / जस का तस , परिस्तिथियों मे कोई परिवर्तन नही / यह देश की नेतृत्व क्षमता पर सवाल खड़ा करता है / ऐसा लगता है देश की पूरी शाशन व्यवस्था पर लकवा मार गया है /

याद करिये सन्सद के अन्दर होने वाली लोक पाल विधेयक पर बहस का / किस तरह देश के चुने हुये सान्सद और नेता हुन्कारें भरते हुये और देश की जनता को चुनौती देते हुये इस बात का आभास करा रहे थे और जिससे यही ध्वनित होता था कि ” हम भ्रष्टाचार को नही खत्म करेन्गे और इसे खत्म करने के लिये किये जाने वाले सभी प्रयासों को नेस्तनाबूद कर देन्गे / हम उन तत्वों को भी कुचल कर रख देन्गे जो भ्रष्टाचार को देश से खत्म करने की बात करेन्गे /”

जिस देश के नेता देश की सबसे बड़ी पन्चायत में यह बयान दे रहे हों, हुन्कारें भर रहे हों , देश की जनता को चुनौतियां दे रहे हों , ऐसी स्तिथि और समय में सबको सचेत हो जाना चाहिये था / लेकिन देश की जनता सोती रही और नौबत फिर जस की तस पैदा हो गयी /

मेरे विचार से अन्ना हजारे को किसी नये राज्नीतिक दल या राज्नीतिक सन्गठन को बनाने की आवश्यकता नही है /जो ऐसा कह रहे है और सलाह दे रहे है, यही तो सरकार और उसका नेतृत्व चाहता है कि अन्ना ऐसी गलती करें और उनका काम आसान हो जाये / यह सरकार कार्पोरेट घराने चला रहे है / सभी जानते है कौन किसके हाथ बिका हुआ है / सभी के हाथ भ्र्ष्टाचार से सन्रे हुये है / कोई भी ईमान्दार नेता आज की तारीख मे नही नजर आता, चाहे वह मन्मोहन सिन्घ खुद क्यों न हों, उन्होने भी कभी न कभी किसी न किसी के साथ भ्रष्टाचार जरूर किया होगा या भ्रष्टाचार के बराबर का समझौता किया होगा /

मेरा मानना है कि अन्ना शायद गान्धी वादी परम्परा के अन्तिम नेता साबित होन्गे / मै दूर दूर तक नजर दौड़ाता हूं तो मुझे आज की तारीख में कोई भी नेता नजर नही आता जो गान्धी वादि हो और गान्धी के उसूलों पर चलने वाले हों / खुद कान्ग्रेस के अन्दर कोई भी गान्धी के दर्शन वाला बचा हो , ऐसा मुझे कोई नही दीखता / गान्धी कानग्रेस के लिये भी अछूत हो गये हैं / उनको फायदे के लिये या बोट बैन्क के लिये सभी नाम लेते है / स्पष्ट है कि गान्धी जी की विचार धारा इस देश के लिये फेल साबित हुयी है /

देश की जनता भी बटी हुयी है / जिनको बात करने की तमीज नही है , वे अन्ना को गन्ना बेचने की सलाह दे रहे है और उनको विदेशी एजेन्ट बता रहे है / ऐसी ऐसी बातें अन्ना के बारे मे लोग कहते है जैसे वे सब उनके बहुत करीबी हो और उनकी सार बाते तक उनको पता हों /ऐसे बेवकूफो के बल पर क्या इतना गम्भीर आन्दोलन चलाने की जहमत उठायी जा सकती है /

जिस देश की down troden society जो कान्ग्रेस का बोट बैन्क हो और जिसको राजनीति की तमीज तक न हो, उसके बल पर ऐसे गम्भीर अन्दोलन नही चलाये जा सकते है / कान्ग्रेस के नेता श्री मोतीलाल जी नेहरू ने इसी लिये महात्मा गान्धी को चुना कि इन्को लन्गोटी पहनाकर उस स्तर तक पहुचा जा सकता है जहां इससे पहले कान्ग्रेस का कोई नेता नही पहुचा था और न पैठ बना सका था / लन्गोटी लगाकर गान्धी जी कान्ग्रेस को झोपड़ी तक ले गये /अन्ना यह सब नही कर पायेन्गे और न अन्ना वोट बैन्क की राज्नीति से पूरी तरह से वाकिफ हैं /

मै इस पक्ष में कतई नही हूं कि अन्ना कोई राजनीतिक दल बनाये / इसमें नुकसान ज्यादा है और फायदा बिल्कुल नही / बेहतर होगा अन्ना अभी कुछ दिन विश्राम करें , अपने स्वास्थय को देखें / देश की जनता मर रही है उसे मरने दें और उसकी कतई फिक्र न करें / इस देश की जनता ही इस काबिल है कि इसे जितना ही अधिक प्रताड़ित करो , इसे जितना ही अधिक  निचोड़ॊ , इसे जितना ही अधिक दबाओ, यह उस प्रताड़ित करने वाले , उस जुल्म करने वाले, उस निचोड़ने वाले को अपना आका समझेगी और आका समझती ही है  और उसकी पूजा करती है और बहुत  खुश होती है / ऐसी सोच वाली जनता के लिये आप कुछ नही कर सकते, / अगर यह अपने करमों और अक्रम्ण्यता से मर रही है तो इसे मरने दीजिये, इसमें जान पूकने की कोशिश न कीजिये/ इसे कोई लूट रहा है तो  लूटने दीजिये / देश की जनता इसी काबिल है /

रही बात भ्रष्टाचार दूर होने या न होने की / जब देश की जनता इस मुद्दे पर बटी हुयी है, सबके अपने अपने तर्क हैं और कुतर्क भी हैं / इसके पीछे जनता की यह मानसिकता काम कर रही है कि भ्रष्टाचार दूर हो जायेगा तो हमे अपनी सात पुश्तों तक के लिये पैसा इकठ्ठा करने को कैसे मिलेगा / इस देश की जनता मृग मरीचिका में जीने के लिये बहुत विश्वास करती है / जिस देश के लोग घूस देकर नौकरी पा रहे हों , जिस देश के लोग नौकरी पाने के लिये हर तरह के भ्रष्ठ तरीके अपनाने में बिल्कुल हिचक न करें, जिस देश की जनता का यह नारा हो कि ” अपना काम बनता  और भाड़ में जाये जनता”  और अपने काम के लिये सभी तरह के  भ्रष्ठ तौर  तरीके अपनाने में लेश मात्र भी हिचक न हो, घूस लेने और देने में विश्वास करती हो कि किसी तरह उसका काम हो जाय , उस देश की जनता के लिये लिये कोई कुछ नही कर सकता है / जिस देश के सरकारी कर्मचारी सुबह सोकर उठते समय आन्ख खुलते ही यह सो्चे और विचार करें और तय कर ले कि आज कार्यालय जाकर वापस होते समय कितनी घूस की रकम जेब में भरकर और उसे लेकर घर आना है ,  उस देश के लिये चाहे दुबारा गान्धी जी  ही क्यों न जन्म लेकर यहां आ जायें , वह भी कुछ नहीं कर पायेन्गे/ अब तो लोग यह भी कहने से नही हिचकते कि गान्धी को कान्ग्रेसियों ने ही मरबा डाला /

दो दिन पहले मुझे कान्ग्रेस के एक कार्य्कर्ता मिले जो रामा देवी , कानपुर में रहते है , उन्होने अपना नाम दयाशन्कर गुप्ता बताया था, उनके साथी से पूछताछ करने के बाद पता चला कि वे पत्रकार के साथ साथ प्रेस प्रिन्टिन्ग  का काम करते है, इन्के खन्दान के लोग बहुत कट्टर कान्ग्रेसी है , इन्का मोबाइल नम्बर ९७९४२२०३६९  है / अब इनका विचार भी समझ लीजिये / ” चुनी हुयी सरकार को सरकार न मानना, ऐसे शख्स अन्ना हजारे को पुलिस भेज कर अच्छी तरह से लठिया देना चाहिये था/  और उनके साथ अनशन करने वालों को गोली मार देनी चाहिये थी ” /

कान्ग्रेस के सभी कार्यकर्ता बहुत खुश हैं कि अन्ना का अन्दोलन “फ्लाप” साबित हुआ/

इसमें खुश होने की बात कोई नही है / आने वाले दिन इस देश की जनता पर भारी होन्गे / इस देश की जन्ता को अपनी अकरमण्यता के लिये बहुत बुरे दिन भोगने होन्गे / प्रजातन्त्र फेल होने की तरफ जा रहा है / लोगों में निराशा व्याप्त है और इसीलिये वे चुनाव में वॊट देने से अब कतराने लगे है , यह सोच कर कि वोट देने से कोई फायदा नही है / जब सारा काम घूस देकर ही कराना है तो फिर कोई भी सरकार आवे , उससे उनका क्या मतलब ? जब जनता की भागीदारी ही नही है और ऊपर बैठे सभी नेता अपने मन का कर रहे है तो चुनावों में वोट देने या न देने से क्या फर्क होगा ? मौजूदा परिस्तिथियों में ऐसा लगता है कि कोई भी बदलाव दूर दूर पचासों साल तक नही होना है  / यह अकर्मण्यता और राजनीतिक दलों की जनता के साथ की जा रही बरगलाने की चेष्टा और बेइमानी और धोखा धड़ी अन्तत: इस देश को ले डूबेगी /

असम, नागालैन्ड, अरुणाचल, कश्मीर, त्रिपुरा और अन्य देश के कई क्षेत्र अपने को इस देश से अलग मान रहे, वे भारतीय कहलाना पसन्द नही करते / तेलन्गाना, खालिस्तान आदि आन्दोलनों का भूत अभी भी जिन्दा है / ब्लैक मेल की राजनीति देश पर हाबी है / सरकार इन समस्याओं को हल करना तो दूर, उसे क्सी चिमटी से भी छूना पसन्द नही करती / यह अकर्मण्यता की हद हो गयी /  महाराष्ट्र का मन्त्री मध्य प्रदेश के खदानों की सम्पदा लूट रहा है /  तमिलनाडु का मन्त्री सारे देश का धन लूट रहा है और खा रहा है , ऐसे में क्या मध्य प्रदेश का जन मानस यह नही सोच सकता कि “बाहर का व्यक्ति हमे और हमारी सम्पदा लूट रहा है ” /

देश टूटने की कगार पर चल ने की दिशा में है / मुझे लगता है कि कहीं देश शक्ति शाली सोवियत सन्घ की तरह टूट कर कहीं अलग अलग राष्ट्रों में न तब्दील हो जाये / क्योन्कि परिस्तिथियां ठीक उसी तरह की बन रही है जैसे किसी समय सोवियत सन्घ में टूतने से पहले बनी थीं /

पश्चिम बन्गाल की मुख्य मन्त्री ममता बनर्जी और उत्तर प्रदेश के मुख्य मन्त्री अखिलेश य़ादव और नेपाल राष्ट्र के नेता पुष्प कुमार दहल के बीच क्या समानता हो सकती है ???

बहुत सी समानतायें इन तीन नेताओं में मुझे नज़र आयी हैं /

१- ये सभी तीनों नेता अपने स्वार्थ के लिये जनता को बरगला करके पहले की सरकारो के खिलाफ झन्डा बरदारी करके और लोक लुभावन नारे बुलन्द करके सत्ता हथिया बैठे है /

२- वास्तविकता यह है कि तीनों नेता इस झन्डा बुलन्दी का काम करते करते ऐसी modus operandi आधारित नेता गीरी की राह बनाते हुये अपने को माहिर और expert समझने लगे कि अगर वे सत्ता में आये तो सब कुछ बदल कर एक ऐसी समाजिक और राज नैतिक और सान्स्कृतिक क्रान्ति कर देन्गे , जिससे सब कुछ उलट पलट हो जायेगा /

३-  यह सब करने के लिये इन सभी नेताओं को तत्कालीन सरकारों के खिलाफ वह सब करना पड़ा और इस तरह से जनता को दिखावा करना पड़ा कि अगर वे सत्ता में आये तो सब कुछ बदल कर रख देन्गे/ जैसे मुलायम सिन्घ का यह कहना कि ” अगर उनकी सरकार सत्ता मे आयी तो सभी पार्कों में लगे हुये हाथियों पर बुल्डोजर चलवा देन्गे” / प्रदेश की जनता आज तक बुल्दोजर चलने की राह देख रही है /  ऐसा कभी भी नही होगा और मुलायम सिन्घ क्या कोई भी देश का सर्वोच्च नेता भी आ जाय तो भी वह ऐसा कभी करेगा भी नही और कर भी नही पायेगा / इसका कारण यह है कि हाथियों और पार्क का निर्माण बिना कैबिनेट के approval  कोई सरकार नही कर सकती और फिर fund  की बात होती है , यह सब sanction सरकार को ही करना पड़्ता है और जहां सरकारी पैसा लगा हो , वहां की सारवजनिक सम्पत्ति क्या कोई भी व्यक्ति या नेता अपनी मन मर्जी से  बुल्डोजर चला कर ध्वस्त कर सकता है ?   यह सरकार के काम करने के  procedure  है /

लेकिन देश या प्रदेश की जनता यह सब नही जानती /जनता के पास  इतना सोचने और समझने का दिमाग  नही है , जिस देश या प्रदेश की जनता मानसिक गरीबी और आर्थिक गरीबी और सान्स्कृतिक गरीबी और शारीरिक गरीबी तथा अन्य गरीबियों से जूझ रहा हो  वहां ऐसी जनता के पास यह सब सोचने का समय कहां है / यही बात भीड़ तन्त्र को बढावा देता है / फलाना भले ही उनको कुयें में ढकेले दे रहा हो लेकिन इस तरह की मान्सिकता वाली जनता उनको कुयें में  ढकेले  जाने वाला ही सबसे बेहतर नेता समझ में आता है / भले ही वह उनको चूस चूस कर नन्गा कर रहा हो लेकिन जनता उसी के पीछे भागती है और उसको अपना आका समझती है /

इसी मानसिकता का फायदा ममता बनर्जी और अखिलेश यादव और पुष्प कुमार दहल “प्रचन्ड” ने उठाया और अपने एक सूत्री कार्यक्रम “नेता ह्टाओ” या “राजा हटाओं” के नारे को बुलन्द करके अपना मकसद पूरा करनें में कामयाब हो गये /

लेकिन इस तरह की कामयाबी  यानी सत्ता पलटने के बाद और कुर्सी मिलने के बाद ये नेता फेल क्यों हो गये या क्यों हो रहे हैं ? इस तीनों मे एक समानता का लक्षण यह भी है /

[3] नेपाल के राजा ग्यानेन्द्र को हटाने के लिये पुष्प कुमार दहल “प्रचन्ड” माओ वदियों को लेकर नेपाल में गुल गपाड़ा मचाये हुये थे / कैसे राज साहब को हटाया जाये और अपनी सत्ता स्थापित की जाये, इसी उधेड़्बुन में उनकी सारी ताकत और सारी मानसिक उर्जा का क्षरण हुआ / मै पुष्प कुमार दहल “प्रचन्ड” से एक बार नेपाल में काठ मान्डू के किसी स्थान पर मिल चुका हूं, यह सन १९७६  के आस पास की बात होगी , जहां तक मुझे याद आता है / अब जब किसी तरह सत्ता मिल गयी  तो उनका राजा को हटाने का जो भी मकसद था , वह पूरा हो गया यानी उनका उद्देश्य पूरा हो गया / इसी के साथ उनके सामने यह नयी समस्या आयी कि अब क्या किया जाये ? सत्ता कैसे समभाली जाय ? यह वह सवाल था जिसके बारे में इन नेताओं को कोई अनुभव नही था कि सत्ता चलायी कैसे जाती है ? इनके पास सत्ता चलाने का कोई दिमाग नही था  और हल भी नही कर सकते थे / यह सवाल एक दम नया था , यह एक ऐसी पेचीदा जिम्मेदारी अचानक इन नेताओं के कन्धे पर आ गयी , जिसको सम्भालने के  लिये वे तैयार नही थे / उधर जनता का दबाव बढता जा रहा था / ऐसी स्तिथि के सामना करने के लिये  और समाधान के लिये प्रचन्ड तैयार नही थे / नतीजा यह निकला कि अपने प्रचन्ड स्वभाव के कारण , जिसके लिये वह काठ मान्डू विश्व विद्यालय में प्रसिध्ध रहे हैं, स्तिथि सम्भाल नही पाये और इसका नतीजा यह निकला कि आज देखिये नेपाल की हालात क्या हो गये हैं ? यही हाल हमारे देश के दो राज्यों के सत्ताधारियों का भी  हुआ/

[४] सभी काम बिना धन या पैसे या सन्साधनों के बगैर नही हो सकते हैं / सरकार चलानी है , शाशन चलाना है, राज्य के जन सेवार्थ सन्साधन जुटाना है तो इसके लिये पैसा चाहिये / ह्हर काम के लिये पैसा चाहिये / तभी काम हो सकता है / गाल बजाकर और शब्द की बौछार करके न तो किसी का पेट भरेगा और न किसी कि तनख्वाह आयेगी / सरकार चलानी है तो पैसा चाहिये / लेकिन यह आयेगा कैसे ????? / भाषण देने में कोई गरीबी नही / कहा भी गया है “वचनम किम दरिद्रता” अर्थात बोलने में क्या गरीबी है ? आपका मुख है , आपकी उर्जा है, आपका गला है, अपका टेटुआ है , आपका सोच है आपकी ताकत है , आपका स्वर है , सब कुछ आपके पास है , जितना चाहे उतना बोलिये, अब इस तरह से बोलने में भी क्या गरीबी  है ?  बाते है , बातों का क्या? ये सभी नेता बातें करके ही सत्ता तक पहुचे हैं , यह नही भूलना चाहिये /  ममता बनर्जी ने देश के सबसे ईमान् दार और करमठ व्यक्ति रतन टाटा को सिन्गूर और नन्दी ग्राम से उनकी दुर्दशा करके राज्य से बाहर निकाल कर कोई बहुत अच्छा और उल्लेखनीय काम नही किया / रतन टाटा को जिस तरह से  ममता बनर्जी ने हटाकर अपने  कारनामों और कलाकारी   करके  भले ही वे सत्ता में आ गयी हों  और कम्युनिष्टॊं को उखाड़ फेन्का हो, लेकिन यह सब टाटा जैसे उद्योगपति को मुख्य मोहरा बनाकर और विलेन बनाकर हासिल की गयी कवायद से सीधे सीधे जुड़ा है / इसका नकारात्मक प्रभाव यह पड़ा कि पश्चिक बन्गाल में कोई भी उद्योगपति अपना पैसा या काम लगाने को तैयार नही / यहां सवाल  सरकार की credibility  और surety से जुड़ा है / कोई अपना पैसा क्यों बन्गाल में लगाये ? यह सब ममता बनर्जी का ह्ठ और उनकी मान्सिकता से जुड़ा है जो प्रजातान्त्रिक उसूलों से कतई नही मेल् खाता है, यह अधिनायक वादी मान्सिकता है / आज क्या हालात है बन्गाल के , सभी जानते है / अखिलेश यदव का भी यही हाल होगा / आदि गो्दरेज का बयान ही इसके लिये काफी है कि “पहले अपना इन्फ्रास्ट्रक्चर सुधारिये”
 

सन्सद के ६० साल और भारतीय लोक तन्त्र

इस समय जब यह पोस्ट लिख रहा हूं, मेरे इलाके की बिजली गायब है / गर्मी इस कदर है कि अगर पन्खा इन्वर्टर से न चलाउं तो ठीक से लिख पढ भी नही सकता / भारतीय सन्सद के आज साठ साल पूरे हो चुके हैं / यह भले ही मौजूदा सान्सदों के लिये एक सुखद घटना-अवसर हो सकता है लेकिन भारत के लोगों के लिये सन्सद के साठ साल में कोई खास उपलब्धि मिली हो. ऐसा ईमान्दारी से यदि मुझे कहना पड़े तो मेरा उत्तर नकारात्मक ही होगा / पिछले साठ साल मे सन्सद की कोई खास उपलब्धि हो, मै अगर बहुत ईमान दारी से याद करता हू तो सिवाय एक या दो ही उपलब्धियां नजर आती है /

बाकी उपलब्धियां देश हित या विश्व राजनीति के मद्दे नजर अगर कोई कहता है तो यह सिवाय पार्टीगत या राजनीति गत ही कही जा सकती है, जो सीधे सीधे वोट बैन्क से जाकर जुड़ जाती है /

एक उपलब्धि मै सबको याद दिलाये देता हूं / जब इन्दिरा गान्धी इलाहाबाद की अदालत से कदाचार के आरोप मे दन्डित की गयी तो बाद में तत्कालीन इन्दिरा गान्धी के नेत्रत्व वाली सरकार द्वारा इमर्जेन्सी इस देश के लोगों पर ठोंक दी गयी थी / सन्सद का कार्यकाल पांच साल से बढाकर छह साल कर दिया गया था / जब जनता पार्टी की मोरार जी देसाई के नेत्रत्व वाली सरकार आयी तो उसने अमेन्ड्मेन्ट करके पुन: पान्च साल का प्रावधान किया और साथ ही एमरजेन्सी के प्रावधान को बदल कर जब तक दो तिहाई बहुमत न हो तब तक लागू करने के नियम को प्रतिपादित किया ताकि कोई भी प्रधान मन्त्री आगे से अपने फायदे के लिये इमरजेन्सी का दुरुप्योग न कर सके / यह सब जन हित और भारतीय लोक तन्त्र को बचाने के लिये किया गया ईमान्दारी से परिपूर्ण कार्य था /

सबसे बड़ी कमी हमारे भारतीय संविधान में है / अगर आप सम्विधान को पढें तो इसमें कमी लगती है / मेरे observation मे कुछ बातें है ;
१- यह “अस्पष्ट” है
२- यह “बिखरा हुआ ” scattered है
३- यह “जिम्मेदारी से रहित ” है
४- यह “Controversial” है
५- यह “जवाब देही नही तय करता” है

जब अटल बिहारी बाजपेयी की सरकार ने सम्विधान की व्याख्या के लिये प्रसिध्ध सम्विधान विशेष्ग्य श्री सुभाष कश्यप की अगुयायी में सम्विधान-समीक्षा के लिये समिति बनायी गयी तो उसका कोई अन्तिम निष्कर्ष या नतीजा नही निकला / अन्दर खाने की बात क्या हो सकती है , यह केवल उस समय की गयी बयान बाजी से अन्दाज कर सकते हैं / ऊपर कही गयी पान्च बातें उभर कर सामने आती है और शायद इसी कारण इस समिति ने चुप रहना ही बेहतर समझा होगा /

कई बार दिल्ली के किसी मन्त्रालय की building से खड़े होकर जब मै अपने गांव देहात के खेत और खलिहान की तरफ देखता हूं तो मुझे बहुत बहुत gap नजर आता है और जब अपने खेत से खड़े होकर मत्रालय की तरफ देखता हूं तो मुझे सरकार नजर नही आती /

मेरा मानना है कि सन्सद दिनों दिन अपनी गरिमा खोती जा रही है / इसके लिये इस देश की जनता और देश की चुनाव प्रणाली जिम्मेदार है /

हमने साठ साल मे सन्सद के अन्दर राजनीतिक ईमानदारी खो दी है /

“सब्सीडी” समाप्त करने और “सब्सीडी” देने का सबसे अच्छा समय

भारत सरकार नागरिकों की सुविधा के लिये सब्सीडी यानी आर्थिक छूट देने के लिये अपने खाते से पेट्रोलियम पदार्थ यथा डीझल, पेट्रोल, रसोई गैस, यूरिया और अन्य खाद तथा इसके अलावा अन्य बहुत सी वस्तुओं पर छूट देती है / उदाहरण के लिये रसोई गैस की वास्तविक कीमत ७५० रुपये के आसपास बैठती है / लेकिन भारत सरकार इसे ४०० रुपये के लगभग नागरिकों को उपलब्ध कराती है / बाकी बचे ३५० रुपये के लगभग भारत सरकार अपने खाते से गैस का सिलिन्डर देने वाली कम्पनियों को भुगतान करती है / यह भुगतान करना ही “सब्सीडी” कही जाती है /

हकीकत और अमली जमीनी स्तर पर देखा जाये तो न तो गैस मिल रही है, न खाद मिल रही है और न डीजल समय पर मिलता है / ग्रामीण क्षेत्रों का हाल यह है कि खाद की बोरी में ३०० रुपये से लेकर ६०० रुपये तक की ब्लैक सीजन में किसानों को देना पड जाता है और सीजन में किल्लत हो जाती है सो अलग, यही हाल डीजल का है / सब जगह विक्रेता लूट मचाये हुये हैं , ताज्जुब की बात यह है कि इसे रोकने वाला कोई नही है / प्राशासनिक व्यवस्था इसलिये फेल साबित होती है , क्योंकि प्रशासन के अधिकारी खुद ही इस लूट खसोट में शामिल है और आपस में ही एक से दूसरे विभाग पर जिम्मेदारी डालकर नूराकुश्ती करते रहते है, क्योंकि घाघ और चालाक अधिकारी पैसा खीचना तो जानता है, लेकिन जिम्मेदारी और जवाब देही कोई नही लेना चाहता /

बहरहाल सरकार को “सब्सीडी” के लिये क्या करना चाहिये, मै अपने सुझाव दे रहा हूं /

१- सरकार द्वारा जितनी भी जहां जहां सब्सीडी दी जा रही है , उसे फौरन खत्म कर देना चाहिये /

२- जो लोग गैस का उपयोग कर रहे हैं या खाद ले रहे हैं या डीजल ले रहे हैं या कोई दूसरी वस्तु, सरकार अगर इसमें जितनी भी सब्सीडी देना चाहे तो “सीधे उपभोक्ता” को दे

३- सीधे उपभोक्ता को सब्सीडी देने से जहा घपला करने की गुन्जाइश है वह समाप्त हो जायेगी /

४- उपभोक्ता को रास्ट्रीय कृत बैन्क में खाता खुलवाना होगा

५- गैस कम्पनी, गैस वितरक या खाद वितरक या डीजल तेल वितरक या सूत वितरक समान का पूरा मूल्य जो निर्धारित होगा, वह उपभोक्ता से लेगा और उसकी खरीद की रसीद देगा /

६- इस रसीद के साथ वितरक एक “चालान” या “रसीद” या “मेमो” या “चेक” देगा जो इस बात को बतायेगा कि उसको कितनी “सब्सीडी” दी जा रही है / यह डाकूमेन्ट या प्रोसीजर कुछ इस तरह का भी हो सकता है जैसे अदालत में जमा पैसों को निकालने के लिये अदालत एक चेक या सनद जारी करती है, जिसे लेकर जिला ट्रेजरी या जिला कोषागार मे जमा करना पड़ता है और कोषागार एक चेक बैन्क के लिये जारी करता है, जिसे बैन्क के खाते मे जमा करते हैं और पैसा खाते में जमा हो जाता है /

७- कुछ इसी तरह का प्रोसीजर बनाकर सब्सीडी का पैसा सीधे उपभोक्ता को मिल जायेगा /

ऐसा कुछ करने से बहुत हद तक इन जिन्सों मे हो रही धान्धागर्दी को रोका जा सकता है /

ये पाकिस्तान में हिन्दुओं के साथ क्या हो रहा है ?

Indian Media मे पिछले कुछ हफ़्ते से पाकिस्तान के हिन्दुओं की लड़कियों को जबरन मुसलमान बनाकर उनसे शादियां की जा रही हैं, जैसी खबरें प्रकाशित हो रही है, जिससे यह घटना क्रम चिन्ता का विषय बनता जा रहा है /

पाकिस्तान सरकार को इस पर तुरन्त रोक लगानी चाहिये / चाहे जैसे भी हो यह जन्गल के कानून जैसी बरबरता है / जबरिया शादी जैसे मसले अगर ऐसे ही पाकिस्तान में होते रहे तो यह पाकिस्तान जैसे मुल्क के लिये आगे आने वाले दिनों में मुश्किलें खड़ी कर देन्गे / अभी तक पाकिस्तान में रहने वाले सिखों का अपहरण करके उनसे फिरौती वसूलने का काम किया जा रहा था / अब पाकिस्तान के हिन्दू निशाना बनाये जा रहे हैं /

पाकिस्तान सरकार को सोचना चाहिये कि एक तो ऐसे ही उसकी फजीहत सारी दुनियां में हो गयी है और उसका विश्वास करना सभी देशों के लिये मुश्किल हो रहा है, ऐसे में अगर इस तरह की घटनायें होन्गी तो उनके मुल्क का मुसतकबिल क्या होगा ?

सरकार को वहां रहने वाले “अल्प सन्खयकों को सुरक्षा की गारन्टी” देना चाहिये, चाहे किसी भी तरह से ऐसा करना पड़े, सरकार करे या वहां की सुप्रीम कोर्ट / पाकिस्तान के नागरिकों को समझना चाहिये कि आपके मुल्क के अन्दर रहने वाले अल्प सन्ख्यक एक ऐसा कमजोर तबका है जो आपकी mercy और दया पर जी रहा है / ये आपकी शरण में है / धर्म कहता है कि जो शरण में रहे या शरण में रह रहा हो , उसकी हिफाजत करना इन्सान का फर्ज है, न्याय तो यही कहता है /