मनमोहन सिह की सरकार का लेखा जोखा १०० दिन से ऊपर का

कहने के लिये कुछ भी उल्लेखनीय नहीं है इन १०० दिनों में सरकार का लेखा जोखा परखने का , सिवाय इसके कि इस देश की जनता का वाकई दिल गुर्दा इतना मजबूत है कि इसे जितना भी सताओ यह कुछ बोलने वाली नहीं । सभी तरफ़ लूट खसोट का बज़ार गरम है अखबार इनसे भरे पड़े हैं लेकिन इस देश की जनता मूक दर्शक बनी हुयी कान मे तेल दाले पड़ी हुयी बैठी है ।

यह बदलना भी नहीं चहती है । देश की जनता स्वयम चाहती है कि लूटने वाले उसे चाहे जितना लूटे वे आवाज़ तक नहीं उठायेंगे ।

नेता जानते हैं कि जनता दो तरीके से गरीब है एक सोचने का मद्दा नहीं है इसलिये दिमाग से गरीब है दूसरे इतना पैसा नहीं है कि आराम से खा पी सकें और सुकून से जीवन बिता सकें  यानी पैसे और धन से भी गरीब हैं ।

फिर क्यों न इस देश के नेता इस कमजोरी का फायदा उठायें  और जनता को हर जगह उल्लू बनायें ?

ये पाकिस्तान में क्या हो रहा है ?

जरा नज़र डालिये पाकिस्तान की जन सन्ख्या पर, क्या कहता है अन्ग्रेजी भाषा का “विकीपीडिया इन्साइक्लोपीडिया” इस बारे में ।

पाकिस्तान की जन्सन्ख्या लगभग 17 करोड़ 28 लाख है । इस जन्सन्ख्या में 95% सुन्नी और शिया मुसलमान है, इसमें सुन्नी मुसलमानों का वर्चस्व ८५ प्रतिशत है । हिन्दुओं की सन्ख्या 32 लाख है , जो पाकिस्तान की आबादी का केवल 1.85% है । क्रिश्चियन्स की आबादी २८ लाख है जो केवल 1.6% है । सरदारों यानी सिखों की आबादी २० हजार है, जो पकिस्तान की कुल आबादी में 0.04% हैं ।

यानी हिन्दु जनता पाकिस्तान में प्रतिह्जार में लगभग १८ व्यक्ति, क्रिस्चियन्स १६ व्यक्ति और सरदार एक्दम नगण्य । यह है स्तिथि पाकिस्तान की , जो अपने यहां के अल्प सन्ख्यक आबादी को ढोना बोझ समझ रहा है । बीस हज़ार सिख भी उनके लिये बोझ बन गये हैं ? किसी भी सिख को वहा न तो नौकरी मिलती है और न वहां वे किसी आधिकारिक पद पर हैं । यही हाल सभी माइनारिटीज का है ।

विकीपीडिया में ऐसे बहुत से तथ्य दिये हुये है, जिन्हें देखकर और पढ्कर लगता है कि इलामावलम्बियों ने यह ठान लिया है कि वे इन सबका धर्म परिवर्तन करके अप्नी आबादी में शमिल करके शत प्रतिशत मुस्लिम आबादी मे तब्दील कर लेगा । हाल ही में पाकिस्तान के कई इलाकों में सिक्खों के ऊपर “जजिया कर” लगाने का क्या अर्थ निकाला जाय ? आज सिक्ख हैं, कल हिन्दू और क्रिष्चियन होंगे ? इस बात की क्या गारन्टी कि ऐसा नही होगा ?

सवाल यह है कि अल्प्सन्ख्यकों को देखने वाला य़ुनाइटेड नेशन्स का यह विभाग क्या कर रहा है ?

हवा का रुख , कहां जा रहा है ?

जैसा कि पहले आशन्का मैने जग जाहिर की थी कि नेताओं की नूरा कुश्ती में “हमाम में सब नन्गे हैं ” वाली मसल चरितार्थ होने जा रही है । सभी दलों को चुनाव में मिले वोटों के रुख को भाम्पकर यह आशन्का हो गयी है कि त्रिशन्कु लोक सभा का मैन्डेट देश की जनता ने जान्बूझकर दिया है । वोटों के दाम देने वाले मौजूद हैं, वोटों के खरीदार घात लगाये बैठे हैं, वोट देने वाला सोचता है, बटन दबाने के लिये पैसे मिल रहे हैं, भले ही एक दो दिन की दारू का खर्चा निकल आयेगा । ऊससे इस बात से क्या मतलब कि मुम्बई में कौन देश हमला कर रहा है, उससे इस बात का क्या सरोकार कि महगायी में कौन कितना पिस रहा है और इसका जिम्मेदार कौन है ? उसको सिर्फ़ अपने सेमतलब है कि नेता जी कुछ दे रहे है, ले लो, और बटन दबाओ । यह है देश के ऐसी सोच रखने वाले ३०% जनता, जिसे केवल प्याज से मतलब है और प्याज में ही उनकी सारी राजनीति समाई हुयी है । प्याज ही उनकी जान है और प्याज में ही उनके प्राण बसते हैं ।

य़ह भारतीय लोकतन्त्र का चेहरा है । क्षेत्रवाद ने तो और दुर्दशा करके रख दी है । अब यही तो फायदा है क्षेत्रीय दलों को कि उनको कितनी कीमत चुकाकर बहुमत लेना होगा ।

सरकार किसी की भी बने, मज्बूत और कमजोर तो लोकतन्त्र होगा । इस तरीके से बनायी गयी सरकारे इस देश की जनता की मानसिकता दर्शाती हैं । इसके अलावा कुछ नहीं ।

जेल में बन्द साध्वी प्रग्या पर दूसरे कैदी द्वारा हमला

ताज्जुब की बात है, इस देश का मीडिया किसी नेता के छींक देने की स्टाइल को खबर बना देता है । एक दूसरा चैनेल तो इतना तेज़ है कि खबर आधी मिलते ही बाकी की आधी खबर खुद जोड़्कर प्रसारित कर देता है, इससे पहले की दूसरा चैनेल उस खबर को ब्राड्कास्ट करे । श्टिन्ग आप्रेशन करने वाले बड़े बड़े धाकडी पत्रकार पैदल हो गये । पर किसी भी चैनेल ने यह खबर नहीं प्रसारित की कि साध्वी प्रग्या पर साथ में बन्द एक मुसलमान कैदी द्वारा हमला करके उनकी मुह, औ चेहरे की अच्छी खासी धुनाई कर दी गयी ।

यह खबर मुझे आज के “MSN Internet news” द्वारा मालुम हुयी । आज किसी भी चैनेल ने यह खबर प्रसारित नहीं की । अब हमे लगने लगा है कि टी०वी० चैनेल विश्वास योग्य नही रह गये हैं ।

ळोक सभा के चुनाव के पहले चरण के मतदान का सन्शय

पहले चरण का मतदान सम्पन्न हो चुका है । जैसा कि अनुमान लगाया जा रहा था कि चुनाव शान्ति पूर्वक होन्गे, वह तो नही हुआ । नक्सलियों के हमले ने पुलिस बल पर हमला करके अपनी मन्शा जग जाहिर कर दी है । आशन्का की जा रही थी कि कि चुनाव में बिघ्न और बाधायें डाली जायेंगी , वैसा तो हुआ नहीं । मतदान का प्रतिशत कमोवेशी उतना ही रहा, जितना की होना चाहिये । फिर भी उस तरह का उत्साह मतदाताओं में नही देखने को मिला, जितना कि होना चाहिये था । यह लजिमी भी है । जब खाने पीने की चीजों के दाम लगातार हर दिन बढ रहे हों , तो लोग अपना पॆट देखेन्गे या चुनाव का बैलेट ।

गर्मी का मौसम, ग्रामीण क्षेत्रों में फसल कटाई का समय, परीक्षायें , यह सब कारण हैं, जिनसे कम मतदान हुआ । फिल्हाल किसे कितना वोट मिला, कौन पार्टी आगे है या पीछे, यह तो बाद में पता चलेगा, लेकिन वोटों के बन्टवारे में कान्ग्रेस और बीजॆपी सबसे आगे हैं, बाकी सब पीछे ।

वरुण गान्धी के फैक्टर से सवर्ण मतदाता अन्दर ही अन्दर बहुत नाराज

उत्तर प्रदेश की मुख्य मन्त्री मायावती का वरुण गान्धी के खिलाफ़ रासुका लगाये जाने से अन्दर ही अन्दर सवर्ण मतदाता बहुत नाराज है । जिसे आज सोसल एन्जीनियरिंग कहकर महिमा मन्डित किया जा रहा है, वह सोसल इन्जीनियरिंग इस लोक सभा के चुनाव में चलने वाली नहीं है । प्रदेश में विधान सभा के चुनाव का समिकरण कुछ दूसरा था, तब थोड़े समय के लिये यह युक्ती काम आ गयी । ळोक सभा के चुनाव में यह काम नही आ पायेगी, यह तो तय है ।

वरुण गान्धी पर रासुका लगाने से सभी सवर्ण बहुत आहत हुये हैं । झिस तरह से यह लगाया गया, इसके पीछे की मन्शा का भी पर्दाफास हो चुका है । सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा है कि ज्यादती हुयी है ।

अब यही फैक्टर मायावती की लुटिया डुबो देगा । बहुजन समाज पार्टी बहुत बुरी तरह से हारेगी । इनका आन्कड़ा जितना सन २००४ के चुनाव में था, उतना ही बना रह पायेगा, इसमें भी सन्देह है ।

क्षेत्रीय दलों की सरकार बनने में अहम भूमिका

यह तो तय है की त्रिशन्कु लोक सभा बनेगी, क्योंकि न तो काग्रेस को स्पस्ट बहुमत मिलेगा और न बीजॆपी को । दोनों ही दल बहुमत के आन्कड़े से नीचे ही रहेगे । सरकार तो बननी है, यह समवैधानिक मज्बूरी है । कैसे बनेगी, यह सभी राजनीतिक दलों की मजबूरी है कि वे किस तरह की सरकार बनाना चाहेन्गे । दो ध्रुव बने हैं । क्षेत्रीय दल अपना फाय्दा देखेन्गे । एक धर्म निर्पेक्षता को दुहाई लेकर लेकर और दूसरा साम्प्रदायिक तत्वों के खिलाफ, यह बहाना लेकर और अपना नफा नुकसान देखकर, जोड़बन्दी करेंगे कि कान्ग्रेस को सपोट किया जाये या भाज्पा को । सभी दल अपना फायदा देखेंगे । यहां मूल्यों की राज्नीति होगी ।

इस देश की जनता को क्या मिलेगा ? मेरे खयाल से कुछ भी नहीं , शून्य मिलेगा । जनता केवल टैक्स भरे, गरीबी के नाम पर मुफ्त का पैसा लेने की होड़ में जुटे । अपनी मुसीबत में और अधिक इजाफा करे । कौन इस देश की सेवा करता है ? सब बकवास है । नेताओं के हलफ़्नामें देख लिजिये, करोड़ों के मालिक है फिर भी गरीब है ।